जशपुर रियासत के ‘जन-राजा’ रणविजय प्रताप सिंह जूदेव, राजसी विरासत और सादगी के संगम​जशपुर की पावन माटी से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक, राजा रणविजय प्रताप सिंह जूदेव का व्यक्तित्व एक ऐसी गौरवगाथा है, जिसमें रियासत का ताज भी है और सादगी की बेमिसाल तस्वीर भी। वे इस दौर के राजा रणविजय प्रताप सिंह जूदेव हैं, जिनकी शख्सियत का अंदाज़ जशपुर से दिल्ली तक सरलता और सेवा का पर्याय बन चुका है।

​जशपुर रियासत के राजा विजय भूषण सिंह के पोते और स्वर्गीय उपेंद्र सिंह जूदेव के पुत्र, रणविजय प्रताप सिंह ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में अपनी एक अमिट पहचान बनाई है। उन्होंने अपने दादा, पिता और विशेष रूप से अपने चाचा, स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव से प्रेरणा लेकर समाज सेवा के कठिन मार्ग को चुना। 7 मार्च 1969 को जन्मे रणविजय सिंह ने अपने परिवार की समृद्ध विरासत को केवल संजोया ही नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक कार्यों के माध्यम से उसे नई ऊंचाइयां भी दीं। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने जशपुर की मिट्टी में स्थानीय परंपराओं और आधुनिक शिक्षा का सुंदर समन्वय सीखा।

​अपने चाचा दिलीप सिंह जूदेव के पदचिह्नों पर चलते हुए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 2007 में छत्तीसगढ़ राज्य युवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने युवाओं के कल्याण के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। दिलीप सिंह जूदेव के देहावसान के बाद, वे जशपुर से दिल्ली की संसद तक पहुँचने वाले पहले व्यक्ति बने, जब वर्ष 2014 में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा सांसद के रूप में देश की सर्वोच्च पंचायत में भेजा। वहाँ उन्होंने छत्तीसगढ़ और विशेषकर जशपुर क्षेत्र के मुद्दों को बड़ी प्रखरता से उठाया।

​राजनीति के इतर, उनका जीवन आदिवासी समुदायों के उत्थान और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रति समर्पित रहा है। वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों के साथ मिलकर उन्होंने धर्मांतरण रोकने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए निरंतर कार्य किया। वे आज भी जशपुर के ‘आराम निवास महल’ में अपने परिवार के साथ रहते हैं, जहाँ उनकी पत्नी और बच्चे भी समाज सेवा की इस पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

​उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनका सरल स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व है। राजपरिवार का प्रमुख होने के बावजूद उनमें रत्ती भर भी अहंकार नहीं झलकता। वे आज भी किसी चाय की दुकान की महफ़िल हो या चार लोगों का जमावड़ा, वहाँ रुककर लोगों का कुशल-क्षेम पूछना नहीं भूलते। जो सम्मान वे शहरों में पाते हैं, वही स्नेह और आदर वे गाँवों के अंतिम व्यक्ति और यहाँ तक कि अपने राजनीतिक विरोधियों को भी देते हैं। यही वजह है कि जशपुर रियासत के 700 गाँवों में आज भी उन्हें राजसी सम्मान के साथ ‘रियासत के जनता का राजा’ माना जाता है।

​रियासत की धार्मिक परंपराओं में उनकी भूमिका आज भी अनिवार्य है। विजयदशमी का दस दिवसीय उत्सव हो, इंद्र पूजा हो या कोई अन्य अनुष्ठान, राजा की उपस्थिति के बिना इन्हें अधूरा माना जाता है। इन परंपराओं का निर्वहन वे पूरी जिम्मेदारी और आस्था के साथ करते हैं। राजा रणविजय प्रताप सिंह जूदेव का जीवन समर्पण और नेतृत्व का जीवंत प्रतीक है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्पद रहेगा।

 

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