विशेष इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट | 28 फरवरी, 2026
एक ओर सरकार ‘ग्रीन क्लीन मिशन’ चला रही है, तो दूसरी ओर पहाड़ों और जंगलों की ओट में एक ऐसा साम्राज्य फल-फूल रहा है जिसकी जड़ें देश के सात राज्यों तक फैली हैं। ओडिशा का दुर्गम इलाका आज देश के लिए ‘गांजा कैपिटल’ बनता जा रहा है, जहाँ धान से 100 गुना अधिक मुनाफे के लालच में सफेदपोश तस्करों और नक्सलियों के गठजोड़ ने एक संगठित उद्योग खड़ा कर दिया है।
ओडिशा के दुर्गम जंगलों से निकलकर उत्तर भारत की गलियों तक फैला ‘गांजा कॉरिडोर’ आज एक ऐसी चुनौती बन चुका है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। यह केवल एक अवैध खेती का मामला नहीं, बल्कि 800 करोड़ रुपये का एक ऐसा संगठित साम्राज्य है, जिसकी जड़ें अब ओडिशा के 20 जिलों तक फैल चुकी हैं। मलकानगिरी का स्वाभिमान आंचल, कंधमाल, कोरापुट और रायगढ़ा जैसे इलाके इस काले कारोबार के पावर सेंटर बन गए हैं। विशेष रूप से आंध्र प्रदेश की सीमा से सटा चित्रकोंडा का इलाका अपनी ‘प्रीमियम क्वालिटी’ के गांजे के लिए कुख्यात हो चुका है, जहाँ नक्सलियों के कड़े संरक्षण में हजारों एकड़ भूमि पर मौत की यह फसल लहलहा रही है।
इस पूरे धंधे का अर्थशास्त्र इतना मजबूत है कि यह धान की खेती के मुकाबले 100 गुना अधिक मुनाफा देता है। जिस गांजे की कीमत ओडिशा के सुदूर गांवों में 2 से 6 हजार रुपये प्रति किलो होती है, वही बाहरी राज्यों और बड़े शहरों में पहुंचते-पहुंचते 25 हजार रुपये प्रति किलो तक बिकने लगता है। यही कारण है कि उत्तर भारत के बड़े-बड़े सेठ और फाइनेंसर इन इलाकों में आकर अग्रिम निवेश करते हैं। प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस का पहुंचना आज भी जोखिम भरा है। वहीं, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अभाव के कारण गरीब आदिवासी भी इस खेती को आय का मुख्य जरिया मान बैठे हैं, जिससे इस नेटवर्क को तोड़ना और भी जटिल हो गया है।
तस्करी के रास्तों की बात करें तो छत्तीसगढ़ इस पूरे खेल में एक ‘ट्रांजिट हब’ या गेटवे की भूमिका निभा रहा है। ओडिशा से निकलने वाली अवैध खेप बस्तर के जगदलपुर, सुकमा और बोरीगुमा के रास्तों से होती हुई उत्तर भारत की ओर बढ़ती है। तस्करों ने अब नेशनल हाईवे के अलावा रायगढ़, जशपुर, सिमडेगा और अंबिकापुर के उन छोटे रास्तों को अपना लिया है, जहाँ पुलिस की गश्त कम होती है। तस्करी के तरीके भी इतने शातिर हैं कि सुनकर हैरानी होती है; एम्बुलेंस, पानी के टैंकर और लग्जरी वाहनों में विशेष ‘सीक्रेट चेंबर’ बनाए जा रहे हैं। कई बार तो सब्जी की गाड़ियों में नीचे गांजा भरकर ऊपर सब्जियां लाद दी जाती हैं, जिससे जांच चौकियों पर तैनात कर्मी गच्चा खा जाते हैं।
हालांकि, इस काले कारोबार के खिलाफ ओडिशा सरकार ने ‘ग्रीन क्लीन मिशन 2026’ का बिगुल फूँक दिया है। सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन के जरिए अवैध फसलों की पहचान की जा रही है और संयुक्त कार्य बल (STF) हर दिन सैकड़ों एकड़ फसल को नष्ट कर रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जब तक बड़े मगरमच्छ यानी मुख्य तस्कर पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहेंगे, तब तक यह धंधा थमता नजर नहीं आता। अक्सर कार्रवाई केवल गरीब ड्राइवरों और कूरियर तक सिमट कर रह जाती है, जबकि असली मास्टरमाइंड पर्दे के पीछे से खेल चलाते रहते हैं।
चिंता का सबसे बड़ा विषय यह है कि यह कॉरिडोर अब केवल गांजे तक सीमित नहीं रहा; इसके जरिए अब सिंथेटिक ड्रग्स, स्मैक और नशीली गोलियां भी युवाओं तक पहुंचाई जा रही हैं। रायपुर, बिलासपुर और रायगढ़ जैसे शहरों के नाबालिग इस दलदल में फंसकर अपराध की ओर बढ़ रहे हैं। प्रशासन अब किसानों को सब्जी की खेती जैसी वैकल्पिक आजीविका से जोड़ने का प्रयास कर रहा है, ताकि उन्हें इस अपराध की दुनिया से बाहर निकाला जा सके। यह लड़ाई केवल कानून की नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को नशे के इस जाल से बचाने की है।


