जगदलपुर: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी हत्याकांड मामले में जगदलपुर स्थित एनआईए (NIA) स्पेशल कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई है। घटना के 13 साल बाद विशेष न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत ने यह फैसला सुनाया है। हालांकि, कानूनी प्रावधानों के तहत इस सजा के क्रियान्वयन के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की संपुष्टि (Confirmation) अनिवार्य होगी।
सजा पाने वाले 10 दोषी
इस मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, जिनमें से सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मृत्यु हो चुकी है। शेष 10 दोषियों के नाम निम्नलिखित हैं:
- प्रमिला मोडियम
- चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना
- सुमित्रा उर्फ सुमित्रा पुनेम मोडियम
- मुक्का मांडवी
- कोसा कवासी उर्फ कोसाराम
- आयता मरकाम
- मदकामी देवा
- जोगा मदकामी
- बनजामी सन्ना उर्फ चमरू उर्फ डेंगा
- महादेव नाग
क्या था झीरम घाटी हत्याकांड? (पूरा घटनाक्रम)
यह देश के सबसे बड़े राजनीतिक और नक्सली हमलों में से एक है:
साल 2013 के अंत में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव होने थे, जिसके मद्देनजर कांग्रेस पार्टी राज्यभर में ‘परिवर्तन यात्रा’ निकाल रही थी।25 मई 2013 को सुकमा में एक विशाल रैली का आयोजन किया गया था। रैली समाप्त होने के बाद कांग्रेस नेताओं का लगभग 25 गाड़ियों का काफिला सुकमा से जगदलपुर की ओर लौट रहा था, जिसमें करीब 200 नेता और कार्यकर्ता शामिल थे। इस काफिले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस की पूरी शीर्ष लीडरशिप मौजूद थी।
दोपहर करीब 3:40 बजे जब काफिला झीरम घाटी पहुंचा, तो नक्सलियों ने पहले से योजना बनाकर पेड़ों से रास्ता रोक दिया था। गाड़ियां रुकते ही घात लगाए बैठे 200 से अधिक नक्सलियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। इस भीषण गोलीबारी में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल की मौके पर ही मौत हो गई। लगभग डेढ़ घंटे तक अंधाधुंध गोलीबारी होती रही शाम करीब 5:30 बजे नक्सली पहाड़ियों से नीचे उतरे और एक-एक गाड़ी की तलाशी ली। ‘सलवा जुडूम’ आंदोलन शुरू करने के कारण नक्सली बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। नक्सलियों ने उन्हें ढूंढकर बेहद बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया और उनके शरीर पर करीब 100 गोलियां दागी गईं।इस भीषण नृशंस हमले में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित कुल 32 लोगों की जान चली गई थी।
खुफिया तंत्र की भारी चूक और सुनियोजित तरीके से किए गए इस खूनी हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अब घटना के 13 साल बाद आए इस विशेष न्यायालय के फैसले को न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।



