छत्तीसगढ़ विधानसभा: स्कुल शिक्षा और निर्माण कार्यों पर उठेंगे बड़े सवाल

विशेष रिपोर्ट | उच्च शिक्षा विभाग
के बड़े-बड़े दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक गहरी खाई नजर आ रही है। हाल ही में जारी आधिकारिक सरकारी प्रपत्र ने राज्य के कॉलेजों की बदहाल स्थिति को पूरी तरह उजागर कर दिया है। आंकड़ों के इस खुलासे ने शिक्षा जगत में हड़कंप मचा दिया है क्योंकि कॉलेजों का संचालन करने वाले प्राचार्यों से लेकर ज्ञान देने वाले प्रोफेसरों तक के पद भारी संख्या में खाली पड़े हैं।

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सबसे चौंकाने वाली स्थिति प्राध्यापकों की श्रेणी में देखने को मिली है, जहाँ विभाग में कुल 780 पद स्वीकृत होने के बावजूद वर्तमान में कार्यरत प्रोफेसरों की संख्या शून्य है। इसका सीधा मतलब है कि उच्च शिक्षा का मार्गदर्शन करने वाला यह शीर्ष पद पूरी तरह रिक्त पड़ा है।

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संस्थानों के नेतृत्व के लिए जिम्मेदार प्राचार्य के पदों की स्थिति भी चिंताजनक है, जहाँ 343 स्वीकृत पदों के मुकाबले 234 पद खाली हैं, यानी लगभग 70 प्रतिशत कॉलेजों में नियमित प्राचार्य ही नहीं हैं।

यही हाल सहायक प्राध्यापकों का भी है, जहाँ 5415 पदों में से 2512 पद रिक्त पड़े हैं, जिससे छात्रों की नियमित पढ़ाई भगवान भरोसे चल रही है।

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केवल शैक्षणिक ही नहीं, बल्कि छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी ग्रंथपाल के 149 और क्रीड़ा अधिकारी के 135 पद भी रिक्तियों की भेंट चढ़ चुके हैं। प्रशासनिक ढांचा भी बुरी तरह चरमराया हुआ है क्योंकि सहायक ग्रेड-1 के 191 पदों पर अब तक कोई नियुक्ति नहीं हो पाई है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में रिक्तियां न केवल पढ़ाई की गुणवत्ता को गिरा रही हैं, बल्कि कॉलेजों के प्रशासनिक और शोध कार्यों को भी ठप कर रही हैं। सरकारी आंकड़ों की यह कड़वी सच्चाई सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य पर सवालिया निशान लगाती है कि क्या बिना शिक्षकों और नेतृत्व के ये कॉलेज केवल डिग्री बांटने वाले केंद्र बनकर रह जाएंगे।

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