रायपुर: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ जारी लड़ाई में सुरक्षाबलों और सरकार को एक ऐतिहासिक सफलता मिली है। कभी देश में नक्सलवाद का गढ़ कहे जाने वाले इस राज्य में अब सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों की संख्या घटकर मात्र 3 रह गई है। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य के बड़े हिस्से से अब लाल आतंक का साया लगभग खत्म हो चुका है।

पहले क्या स्थिति थी?

कुछ साल पहले तक छत्तीसगढ़ के 14 से 16 जिले नक्सलवाद से बुरी तरह प्रभावित थे। पूरा बस्तर संभाग और राजनांदगांव जैसे जिले ‘रेड कॉरिडोर’ का हिस्सा माने जाते थे। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पूरे भारत में नक्सली हिंसा वाले जिलों की संख्या भी अब 100 से घटकर बहुत कम रह गई है, जिसमें छत्तीसगढ़ ने सबसे बड़ा सुधार दिखाया है।

नक्सलवाद के खिलाफ इस जंग में ‘सुरक्षा और फॉरवर्ड कैंप’ की रणनीति एक गेम-चेंजर साबित हुई है, जिसने नक्सलियों के अभेद्य किलों को भीतर से ढहा दिया है। पहले जिन इलाकों को ‘नो-गो ज़ोन’ माना जाता था, जहाँ पुलिस कदम रखने से भी कतराती थी, आज वहां सुरक्षाबलों ने ‘किलिंग द वैक्यूम’ रणनीति के तहत सीधे नक्सलियों के कोर इलाकों में घुसकर अपने ठिकाने बना लिए हैं। इन कैंपों ने नक्सलियों के मुक्त विचरण पर लगाम लगा दी है और उनके सबसे मजबूत गढ़ों, जैसे अबुझमाड़ और सिलगेर में सरकार की उपस्थिति दर्ज कराई है।

इन फॉरवर्ड कैंपों का सबसे बड़ा प्रहार नक्सलियों की सप्लाई चेन पर हुआ है। रणनीतिक रास्तों पर कैंप स्थापित होने से नक्सलियों का राशन, दवाइयां और गोला-बारूद ले जाना अब लगभग नामुमकिन हो गया है। यह कैंप केवल सैन्य चौकियां नहीं हैं, बल्कि ये विकास के लिए एक ‘सुरक्षा छाता’ का काम कर रहे हैं। इनके संरक्षण में ही उन दुर्गम जंगलों में सड़कों और पुलों का जाल बिछ पाया है, जिससे सुरक्षाबलों की आवाजाही तेज़ हुई है और नक्सलियों का ‘गुरिल्ला वॉर’ कमजोर पड़ा है।

इतना ही नहीं, इन कैंपों ने स्थानीय आदिवासियों के मन से नक्सलियों का खौफ निकालकर प्रशासन के प्रति विश्वास पैदा किया है। जैसे ही गांव के करीब स्थायी कैंप बनता है, वहां स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा पहुँचने लगती है, जिससे ग्रामीणों का झुकाव सरकार की ओर बढ़ा है और नक्सलियों का सूचना तंत्र ध्वस्त हो गया है। हिड़मा जैसे बड़े नक्सली कमांडरों के गांव पुवर्ती में कैंप का स्थापित होना इस बात का प्रतीक है कि अब सुरक्षाबल पीछे हटने के बजाय नक्सलियों के घर में घुसकर उन्हें चुनौती दे रहे हैं। यही वजह है कि आज नक्सलवाद सिमटकर केवल कुछ जिलों तक रह गया है।

नक्सलवाद के खिलाफ इस जंग में ‘विकास से विजय’ का नारा केवल एक कागजी दावा नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरती एक नई हकीकत है। दशकों तक नक्सलियों ने जिन आदिवासियों को मुख्यधारा से काटकर रखा था, आज सरकार ने वहां सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य के जरिए सीधे उनके दिलों में जगह बना ली है। जैसे-जैसे बस्तर के दुर्गम इलाकों में पक्की सड़कों का जाल बिछा, वैसे-वैसे वहां के गांवों की बाज़ारों और शहरों से दूरी कम होती गई, जिससे न केवल आर्थिक तरक्की आई बल्कि सुरक्षाबलों की पहुँच ने नक्सलियों के भय को भी कम कर दिया।

शिक्षा के क्षेत्र में आई क्रांति ने नक्सलियों के सबसे बड़े आधार पर चोट की है। जहां पहले नक्सली स्कूलों को बम से उड़ा देते थे, आज वहां ‘पोटा केबिन’ और ‘एजुकेशन सिटी’ में बच्चों के हाथ में किताबों ने ले ली है, जिससे नई पीढ़ी हिंसा का रास्ता छोड़कर सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ा रही है। इसके साथ ही, ‘हाट-बाज़ार क्लिनिक’ जैसी योजनाओं ने स्वास्थ्य सेवाओं को घर-घर पहुँचाया है। जब ग्रामीणों ने देखा कि प्रशासन उनके सुख-दुख में साथ खड़ा है और उन्हें मुफ्त इलाज व दवाइयां मिल रही हैं, तो उनके मन में वर्षों से जमी सरकार विरोधी छवि पूरी तरह बदल गई।

बिजली और मोबाइल कनेक्टिविटी ने इस बदलाव में आग में घी का काम किया है। रोशनी और इंटरनेट के आने से नक्सलियों का अंधेरे वाला साम्राज्य ढहने लगा और युवाओं ने बाहरी दुनिया की प्रगति को अपनी आंखों से देखा। स्थानीय युवाओं को ‘बस्तर फाइटर्स’ जैसी नौकरियों के जरिए सम्मान और रोज़गार मिला, जिससे वे खुद अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खड़े हो गए। जब लोगों के पेट भरे और हाथों को काम मिला, तो नक्सलियों का ‘लोकल सपोर्ट’ पूरी तरह से बिखर गया। आज ग्रामीण खुद नक्सलियों को अपने गांवों से खदेड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि उनकी तरक्की बंदूक में नहीं, बल्कि सरकार के साथ कदम मिलाकर चलने में है।

नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग में सटीक खुफिया जानकारी और आधुनिक तकनीक का समावेश एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ है। जहाँ पहले सुरक्षाबल घने जंगलों की भौगोलिक अनिश्चितता के कारण बैकफुट पर रहते थे, आज ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी ने उन दुर्गम पहाड़ियों और जंगलों को पूरी तरह पारदर्शी बना दिया है। ‘आसमान में तीसरी आंख’ के रूप में काम करने वाले हाई-टेक ड्रोन अब रात के अंधेरे में भी नक्सलियों की हरकतों और उनके गुप्त ठिकानों को ट्रैक कर लेते हैं, जिससे उनके पास अब छिपने के लिए कोई सुरक्षित ‘सेफ ज़ोन’ नहीं बचा है।

तकनीक की इस ताकत को स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों (CRPF) के बीच हुए अभूतपूर्व तालमेल ने और भी घातक बना दिया है। पहले सूचनाओं के आदान-प्रदान में होने वाली देरी का फायदा उठाकर नक्सली हमले के बाद भाग निकलने में सफल हो जाते थे, लेकिन अब ‘रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग’ के जरिए खबर मिलते ही चंद मिनटों में संयुक्त ऑपरेशन शुरू कर दिए जाते हैं। राज्यों के खुफिया विंग और केंद्रीय एजेंसियों के बीच की इस आपसी समझ ने नक्सलियों के रणनीतिक नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी ‘ह्यूमन इंटेलिजेंस’ की मजबूती रही है। स्थानीय युवाओं की भर्ती और ग्रामीणों के बीच बढ़ते विश्वास के कारण अब पुलिस के पास ज़मीनी स्तर से ऐसी सटीक जानकारी पहुँच रही है, जो पहले नामुमकिन थी। जब तकनीक के साथ-साथ स्थानीय मुखबिरों का जाल बिछा, तो नक्सलियों के संचार तंत्र (Communication Network) को इंटरसेप्ट करना आसान हो गया। आज इसी तकनीकी और मानवीय खुफिया तंत्र के मेल का परिणाम है कि नक्सली कमांडर या तो सरेंडर करने पर मजबूर हैं या अपने ही गढ़ में घिरते जा रहे हैं।

नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में ‘बस्तर फाइटर्स’ की भर्ती एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक साबित हुई है, जिसने इस लड़ाई के पूरे समीकरण को ही बदल दिया है।

बस्तर फाइटर्स: नक्सलियों के खिलाफ सबसे मजबूत ‘देसी’ ढाल

नक्सलवाद के विरुद्ध जारी संघर्ष में सबसे निर्णायक मोड़ तब आया, जब सरकार ने स्थानीय युवाओं को ही सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया। ‘बस्तर फाइटर्स’ के रूप में तैयार की गई इस फोर्स ने नक्सलियों के उस सबसे बड़े फायदे को छीन लिया है, जिसका वे दशकों से लाभ उठा रहे थे—और वह था ‘भूगोल और भाषा’ पर उनकी पकड़।

 बस्तर फाइटर्स में शामिल जवान उसी मिट्टी और उन्हीं जंगलों में पले-बढ़े हैं, जहाँ नक्सली छिपते हैं। बाहरी राज्यों से आने वाले जवानों के लिए जो घने जंगल एक ‘भूलभुलैया’ थे, बस्तर फाइटर्स के लिए वही जंगल उनका अपना घर हैं। वे न केवल पहाड़ियों और पगडंडियों के हर गुप्त रास्ते से वाकिफ हैं, बल्कि स्थानीय ‘गोंडी’ और ‘हलबी’ जैसी बोलियों में ग्रामीणों से संवाद करने में भी सक्षम हैं। इस भाषाई जुड़ाव ने सुरक्षाबलों और आदिवासियों के बीच की खाई को पाट दिया है, जिससे सूचनाओं का प्रवाह तेज़ हुआ है।

 नक्सली हमेशा यह प्रचार करते थे कि सुरक्षाबल ‘बाहरी’ हैं और वे आदिवासियों के दुश्मन हैं। लेकिन जब गांव के ही लड़के और लड़कियां वर्दी पहनकर सुरक्षा की कमान संभालने लगे, तो नक्सलियों का यह दुष्प्रचार (Propaganda) पूरी तरह फेल हो गया। अब ग्रामीणों के सामने उनके अपने बच्चे थे, जो न केवल सुरक्षा कर रहे थे, बल्कि विकास कार्यों में भी हाथ बंटा रहे थे। इससे नक्सलियों को मिलने वाली सामाजिक सहानुभूति और नए लड़ाकों की भर्ती का रास्ता लगभग बंद हो गया है।

 बस्तर फाइटर्स के जवान जंगल में रहने की कला (Jungle Warfare) में प्राकृतिक रूप से माहिर होते हैं। वे कम संसाधनों में भी लंबे समय तक जंगलों में टिके रह सकते हैं और नक्सलियों के छिपने के सबसे सुरक्षित ठिकानों तक आसानी से पहुँच सकते हैं। आज यह बल न केवल अग्रिम मोर्चे पर लड़ाई लड़ रहा है, बल्कि केंद्रीय बलों (CRPF) के लिए एक सटीक ‘गाइड और इंटेलिजेंस यूनिट’ के रूप में भी काम कर रहा है।

सरेंडर और पुनर्वास नीति: गोलियों का जवाब ‘मुख्यधारा’ के स्वागत से

नक्सलवाद की कमर तोड़ने में सरकार की ‘आकर्षक आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति’ ने एक मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह काम किया है। इस नीति का मूल मंत्र नक्सलियों को खत्म करना नहीं, बल्कि उन्हें ‘गलत रास्ते से सही रास्ते’ पर लाना है। जब सुरक्षाबलों का दबाव बढ़ा और नक्सलियों को अपनी विचारधारा खोखली लगने लगी, तब सरकार ने उन्हें मुख्यधारा में लौटने का एक सम्मानजनक विकल्प दिया।

 इस नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले कैडर्स को केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि तत्काल आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाती है। हथियार सौंपने पर मिलने वाली प्रोत्साहन राशि और पुनर्वास अनुदान ने नक्सलियों को यह अहसास कराया कि सरकार उन्हें अपराधी नहीं, बल्कि भटक गया नागरिक मानती है। इससे उन कैडर्स में भरोसा जगा जो आर्थिक तंगी या जबरन भर्ती के कारण संगठन से जुड़े थे।

 नीति केवल पैसे देने तक सीमित नहीं रही। सरेंडर करने वाले पूर्व नक्सलियों को विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण (जैसे ड्राइविंग, सिलाई, बिजली का काम) दिए जा रहे हैं ताकि वे समाज में सम्मान के साथ अपनी आजीविका कमा सकें। कई पूर्व नक्सली अब पुलिस बल में शामिल होकर या स्वरोज़गार अपनाकर एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन बिता रहे हैं। उनके बच्चों की शिक्षा और परिवार के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सरकार उठा रही है, जो नक्सलियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण साबित हुआ है।

 जब बड़े-बड़े कमांडर और पुराने कैडर्स मुख्यधारा में लौटकर सुखद जीवन जीने लगे, तो इसका गहरा असर जंगलों में छिपे अन्य नक्सलियों पर पड़ा। इससे संगठन के भीतर ‘विश्वास का संकट’ पैदा हो गया। जब एक साथी सरेंडर करता है, तो वह अपने साथ न केवल हथियार लाता है, बल्कि संगठन की कार्यप्रणाली और ठिकानों की महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी भी साझा करता है, जिससे नक्सली नेटवर्क अंदर से खोखला हो जाता है।

  आज बस्तर के गांवों में सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं जहाँ कल तक हाथों में एके-47 रखने वाले हाथ आज हल चला रहे हैं या देश की रक्षा के लिए तिरंगा थामे हुए हैं। सरकार की इस उदार नीति ने हिंसा के चक्र को तोड़कर ‘खून के बदले खून’ की परंपरा को समाप्त किया और शांति व भाईचारे के एक नए युग की शुरुआत की है।

नक्सलवाद के विरुद्ध चल रहे संघर्ष में सड़क संपर्क (Road Connectivity) ने एक ऐसी ‘लाइफलाइन’ का काम किया है, जिसने सुरक्षा के समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। घने और दुर्गम जंगलों के बीच बिछते डामर के इन रास्तों ने न केवल भौगोलिक बाधाओं को खत्म किया, बल्कि नक्सलियों के सबसे बड़े हथियार—’दुर्गमता’—को भी छीन लिया है।

विकास की राह और आतंक का अंत

नक्सलवाद के खिलाफ युद्ध में सड़कों का निर्माण महज बुनियादी ढांचे का विकास नहीं, बल्कि एक रणनीतिक जीत है। दशकों तक नक्सलियों ने बस्तर के अंदरूनी इलाकों में सड़क निर्माण का हिंसक विरोध किया, क्योंकि वे जानते थे कि पक्की सड़कें उनके ‘सुरक्षित अभयारण्यों’ को नष्ट कर देंगी। आज वही सड़कें नक्सलियों के पतन का सबसे बड़ा कारण बन रही हैं।

  पहले जिन इलाकों में पहुँचने के लिए जवानों को घंटों पैदल चलना पड़ता था और जहाँ ‘एम्बुश’ (घात लगाकर हमला) का खतरा हर कदम पर रहता था, आज वहां बख्तरबंद गाड़ियाँ मिनटों में पहुँच रही हैं। सड़कों ने सुरक्षाबलों की ‘रिस्पॉन्स टाइम’ को बहुत कम कर दिया है। अब नक्सलियों के लिए हमला करके घने जंगलों में गायब हो जाना आसान नहीं रहा, क्योंकि सड़कों के माध्यम से बैकअप फोर्स और लॉजिस्टिक सपोर्ट बहुत तेज़ी से घटनास्थल तक पहुँच जाता है।

 नक्सलियों की पूरी रणनीति जंगलों की गहराई और पहुँच से दूर होने पर टिकी थी। सड़कों ने उन ‘ब्लैक होल्स’ को खत्म कर दिया है जहाँ प्रशासन की पहुँच नहीं थी। सड़क के दोनों ओर वन विभाग और पुलिस की गश्त बढ़ने से नक्सलियों का मुक्त आवागमन (Free Movement) बाधित हुआ है। अब वे खुलेआम सड़कों को पार नहीं कर सकते और न ही पहले की तरह बेखौफ होकर अपनी बैठकें आयोजित कर सकते हैं।

 ये सड़कें केवल पुलिस की गाड़ियाँ नहीं लातीं, बल्कि अपने साथ एंबुलेंस, स्कूल बसें और व्यापार भी लाती हैं। जब एक सुदूर गांव सड़क से जुड़ता है, तो वहां का किसान अपनी उपज (जैसे महुआ, इमली या धान) सीधे बड़े बाज़ारों तक ले जा पाता है। बिजली के खंभे और संचार के तार भी इन्हीं सड़कों के साथ-साथ चलते हैं। जब ग्रामीणों ने देखा कि सड़क आने से उनकी ज़िंदगी आसान हो रही है, तो उन्होंने सड़क काटने या निर्माण रोकने के नक्सलियों के फरमानों को मानना बंद कर दिया।

 सड़क निर्माण ने नक्सली विचारधारा के उस ‘अंधेरे’ को खत्म कर दिया है जिसमें वे फलते-फूलते थे। आज बस्तर की ये पक्की सड़कें इस बात का प्रमाण हैं कि विकास की रफ़्तार के आगे आतंक की ताकत ज़्यादा समय तक नहीं टिक सकती। ये सड़कें केवल दो स्थानों को नहीं जोड़ रही हैं, बल्कि आदिवासियों के भरोसे को देश के लोकतंत्र से जोड़ रही हैं।

नक्सलवाद की जड़ें काटने के लिए ‘शिक्षा और रोजगार’ को सबसे शक्तिशाली हथियार बनाया गया है। इसका उद्देश्य केवल साक्षरता बढ़ाना नहीं, बल्कि युवाओं के हाथों से बंदूक छीनकर उन्हें हुनर और आत्मनिर्भरता देना है।

शिक्षा और रोजगार: वैचारिक अंधकार से आत्मनिर्भरता की ओर

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में शिक्षा और कौशल विकास ने एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है जिसे पार करना अब नक्सलियों के लिए नामुमकिन होता जा रहा है। सरकार ने यह समझ लिया था कि जब तक युवाओं के पास भविष्य की कोई स्पष्ट राह नहीं होगी, तब तक वे नक्सलियों के झूठे प्रचार का शिकार होते रहेंगे।

  नक्सलियों ने रणनीति के तहत बस्तर के सैकड़ों स्कूलों को बम से उड़ा दिया था ताकि नई पीढ़ी अनपढ़ रहे और उनके साथ जुड़े। इसके जवाब में सरकार ने ‘पोटा केबिन’ (पोर्टेबल केबिन) स्कूलों की शुरुआत की। ये स्कूल बांस और लकड़ी के बने सुरक्षित आवासीय परिसर हैं, जहाँ नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के बच्चे रहकर पढ़ाई करते हैं। इन स्कूलों ने न केवल शिक्षा की निरंतरता बनाए रखी, बल्कि बच्चों को नक्सलियों की जबरन भर्ती (Bal Sangham) से भी बचाया। आज इन केबिनों से निकलकर बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर और अधिकारी बन रहे हैं।

 केवल किताबी ज्ञान काफी नहीं था, इसलिए नक्सल प्रभावित जिलों (जैसे दंतेवाड़ा) में ‘आजीविका कॉलेज’ (Livelihood Colleges) खोले गए। यहाँ स्थानीय युवाओं को उनकी रुचि के अनुसार मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिशियन, सिलाई, ड्राइविंग और कंप्यूटर जैसे क्षेत्रों में अल्पकालिक प्रशिक्षण दिया जाता है। जब एक युवा के पास हाथ में हुनर और जेब में रोज़गार की गारंटी होती है, तो वह हिंसा के खोखले वादों की ओर नहीं भटकता। इन कॉलेजों ने हज़ारों युवाओं को ‘बेरोजगारी के जाल’ से निकालकर मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बना दिया है।

 शिक्षा और रोज़गार के इन प्रयासों ने नक्सलियों के ‘भर्ती नेटवर्क’ को ध्वस्त कर दिया है। अब बस्तर का युवा यह समझ चुका है कि जल-जंगल-ज़मीन की रक्षा बंदूक से नहीं, बल्कि शिक्षा और कानूनी अधिकारों के ज्ञान से संभव है। जब स्थानीय युवा मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने लगे या खुद का स्टार्टअप शुरू करने लगे, तो नक्सलियों के लिए ‘जल, जंगल, ज़मीन’ का पुराना नारा अपनी चमक खोने लगा।

 शिक्षा ने जहाँ आदिवासियों की नई पीढ़ी के सोचने का नज़रिया बदला है, वहीं रोज़गार ने उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया है। आज पोटा केबिन और आजीविका कॉलेज से निकलने वाली सफलता की कहानियाँ नक्सलियों की बंदूक की आवाज़ पर भारी पड़ रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि कलम और कौशल की ताकत किसी भी आतंक से बड़ी होती है।

अंतिम गढ़: सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर पर निर्णायक प्रहार

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का भूगोल अब सिमटकर बस्तर के तीन प्रमुख जिलों—सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर—तक सीमित रह गया है। यह वह क्षेत्र है जिसे कभी नक्सलियों का ‘अभेद्य किला’ कहा जाता था, लेकिन आज यहाँ सुरक्षाबलों का घेरा इतना सख्त है कि नक्सलियों का अस्तित्व बचाना मुश्किल हो गया है। सरकार ने मार्च 2026 तक भारत को पूरी तरह ‘नक्सल मुक्त’ करने का जो लक्ष्य रखा है, उसकी सफलता की कुंजी अब इन्हीं तीन जिलों में छिपी है।

 इन जिलों में नक्सलियों के बचे-कुचे प्रभाव को खत्म करने के लिए ‘पिंसर रणनीति’ (Pincer Strategy) अपनाई जा रही है। सुरक्षाबलों ने सुकमा और बीजापुर के उन अंदरूनी इलाकों में नए कैंप स्थापित किए हैं जहाँ पहले कभी शासन की पहुँच नहीं थी। नारायणपुर के अबुझमाड़ जैसे सघन वन क्षेत्रों में, जिन्हें नक्सली अपना सुरक्षित मुख्यालय मानते थे, अब सुरक्षाबलों की निरंतर मौजूदगी और हवाई निगरानी ने उनके कमांड स्ट्रक्चर को छिन्न-भिन्न कर दिया है।

 इन 3 जिलों में सुरक्षा घेरा कड़ा करने के साथ-साथ प्रशासन अब ‘सर्जिकल’ ऑपरेशन पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। खुफिया सूचनाओं के आधार पर नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे उनके निचले कैडर में भगदड़ मची है। दंतेवाड़ा और कांकेर जैसे पड़ोसी जिलों के ‘नक्सल मुक्त’ होने के बाद अब पूरी ताकत और संसाधन इन्हीं तीन जिलों में झोंक दिए गए हैं।इन जिलों में केवल गोलियां नहीं चल रही हैं, बल्कि कैंपों के साथ-साथ विकास कार्यों की रफ़्तार भी दोगुनी कर दी गई है। सुदूर गांवों में मोबाइल टावर, पक्की सड़कें और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं ताकि नक्सलियों को मिलने वाली बची-कुची जन-सहानुभूति भी पूरी तरह खत्म हो जाए।

सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर का नक्सल प्रभावित श्रेणी में होना यह दर्शाता है कि अब लड़ाई अपने अंतिम और सबसे निर्णायक दौर में है। प्रशासन का दावा है कि इन जिलों में चल रहे ‘ऑपरेशन क्लीन स्वैप’ के बाद, बस्तर की पहचान बम-धमाकों से नहीं बल्कि अपनी समृद्ध संस्कृति और शांति से होगी।

बंदूक पर भारी पड़ा बैलट और विकास

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या में आई यह भारी गिरावट महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अब बस्तर के जंगलों में बंदूक की गूंज पर विकास की धमक भारी पड़ रही है। वह दौर अब पीछे छूट रहा है जहाँ डर के साये में लोकतंत्र सिसकता था; आज उसकी जगह ‘बैलट’ (मतदान) और ‘बुनियादी सुविधाओं’ ने ले ली है। आदिवासियों ने अब यह साफ कर दिया है कि उन्हें विनाश की विचारधारा नहीं, बल्कि विकास का उजाला चाहिए।

 पिछले कुछ चुनावों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हुआ रिकॉर्ड मतदान इस बात का संकेत है कि जनता का भरोसा अब हिंसा से उठकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर टिक गया है। जब ग्रामीण अपने वोट की ताकत को समझने लगे, तो नक्सलियों की ‘समानांतर सरकार’ का भ्रम अपने आप टूटने लगा। अब वहां की जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए नक्सलियों की ‘जन-अदालत’ में नहीं, बल्कि सरकार के पास जा रही है।

 यदि सुरक्षाबलों के फॉरवर्ड कैंप, तकनीक का सटीक समन्वय और ‘विकास से विजय’ की यह रफ़्तार इसी तरह जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ का नाम ‘नक्सल प्रभावित’ राज्यों की सूची से हमेशा के लिए हट जाएगा। राज्य अब ‘पूरी तरह नक्सल मुक्त’ होने की दहलीज पर खड़ा है। सुकमा और बीजापुर के अंतिम मोर्चों पर जैसे ही शांति की विजय होगी, बस्तर का एक नया अध्याय शुरू होगा—एक ऐसा अध्याय जहाँ केवल शांति, समृद्धि और सुरक्षा होगी।

 यह बदलाव आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और बेहतर छत्तीसगढ़ की नींव रख रहा है। आज की यह सफलता इस बात पर मुहर लगाती है कि जब सरकार की नीयत साफ हो और विकास का इरादा पक्का हो, तो दुनिया की कोई भी हिंसा समाज को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।

Share.

About Us

CG NOW एक भरोसेमंद और निष्पक्ष न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो आपको छत्तीसगढ़, भारत और दुनिया भर की ताज़ा, सटीक और तथ्य-आधारित खबरें प्रदान करता है। हमारी प्राथमिकता है जनता तक सही और निष्पक्ष जानकारी पहुँचाना, ताकि वे हर पहलू से जागरूक और अपडेटेड रहें।

Contact Us

Syed Sameer Irfan
📞 Phone: 94255 20244
📧 Email: sameerirfan2009@gmail.com
📍 Office Address: 88A, Street 5 Vivekanand Nagar, Bhilai 490023
📧 Email Address: cgnow.in@gmail.com
📞 Phone Number: 94255 20244

© 2025 cgnow.in. Designed by Nimble Technology.

error: Content is protected !!
Exit mobile version