भारत बना दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश, चीन को छोड़ा पीछे

गुवाहाटी
स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भारत को बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि मिली है
आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी उन्नत तकनीक विकसित की है जो सूरज की रोशनी की मदद से कार्बन डाइऑक्साइड को मेथनॉल जैसे उपयोगी ईंधन में बदल सकती हैयह खोज बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती का समाधान बनने की दिशा में अहम मानी जा रही है इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ मैटिरियल्स साइंस में प्रकाशित किए गए हैं

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आईआईटी गुवाहाटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर महुया दे ने बताया कि पेट्रोलियम आधारित ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है
इससे पर्यावरणीय असंतुलन और ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए दुनिया भर में वैज्ञानिक CO₂ को स्वच्छ ईंधन में बदलने के तरीकों पर शोध कर रहे हैं

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अब तक ग्रेफाइटिक कार्बन नाइट्राइड नामक सस्ती और गैर विषैली सामग्री पर काम जरूर हुआ लेकिन ऊर्जा का तेजी से नष्ट होना और ईंधन उत्पादन कम होना बड़ी बाधा बना रहा
आईआईटी गुवाहाटी की शोध टीम ने इस समस्या का समाधान निकालते हुए ग्रेफाइटिक कार्बन नाइट्राइड को फ्यू लेयर ग्रेफीन के साथ जोड़ा
ग्रेफीन की उच्च विद्युत चालकता और बेहतर ऊर्जा ट्रांसफर क्षमता के कारण कैटेलिस्ट के भीतर ऊर्जा हानि में उल्लेखनीय कमी आई
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शोध में सामने आया कि ग्रेफीन की मौजूदगी से कैटेलिस्ट लंबे समय तक सक्रिय रहता है
सूरज की रोशनी का बेहतर अवशोषण होता है और चार्ज जनरेशन की प्रक्रिया भी मजबूत होती है
विभिन्न संयोजनों के परीक्षण में 15 प्रतिशत ग्रेफीन वाला कैटेलिस्ट सबसे अधिक प्रभावी साबित हुआ
इसने CO₂ को मेथनॉल में बदलने में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और इसकी स्थिरता भी व्यावहारिक उपयोग के लिए उपयुक्त पाई गई

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यह तकनीक थर्मल पावर प्लांट सीमेंट फैक्ट्रियों स्टील उद्योग और पेट्रोकेमिकल रिफाइनरियों जैसे क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है
औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को ईंधन में बदलकर सर्कुलर कार्बन इकॉनमी को बढ़ावा मिलेगा
इससे स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की ओर भारत का कदम और मजबूत होगा

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अब शोध टीम का अगला लक्ष्य इस तकनीक को प्रयोगशाला से बाहर निकालकर व्यावहारिक स्तर पर लागू करना है
इसके लिए स्केल अप और टिकाऊ सिस्टम विकसित करने पर काम किया जा रहा है
ताकि उद्योगों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को लंबे समय तक स्वच्छ ईंधन में बदला जा सके

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