दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 दिनों से भूख हड़ताल कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ता Sonam Wangchuk को शनिवार को पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। हालांकि अस्पताल पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपना अनशन जारी रखा और दवा लेने से भी इनकार कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम के बाद देशभर में यह सवाल उठने लगा है कि क्या किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ अस्पताल ले जाया जा सकता है? क्या पुलिस जबरन भूख हड़ताल खत्म करवा सकती है? और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तथा भारतीय कानून क्या कहते हैं? आइए आसान भाषा में पूरी बात समझते हैं।
सोनम वांगचुक को अस्पताल क्यों ले जाया गया?
Sonam Wangchuk लगातार 21 दिनों से जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे थे। उनकी बिगड़ती सेहत को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। पुलिस का कहना है कि उसने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश का पालन किया, जिसमें जरूरत पड़ने पर मेडिकल सहायता देने और स्वास्थ्य पर नजर रखने को कहा गया था।
वहीं, वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि पुलिस ने उनकी सहमति के बिना उन्हें जबरन हटाया और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया। उन्होंने वांगचुक को किसी निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की भी मांग की है।
क्या भूख हड़ताल करना मौलिक अधिकार है?
भारत में Hunger Strike, Peaceful Protest और Right to Protest को संविधान के तहत महत्वपूर्ण अधिकार माना गया है।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था, ट्रैफिक तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार उचित प्रतिबंध लगा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले:
- संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है।
- सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता।
- सरकार स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए मेडिकल सहायता उपलब्ध करा सकती है।
- विरोध प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती।
क्या पुलिस जबरन अनशन तुड़वा सकती है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी व्यक्ति का अनशन उसकी इच्छा के खिलाफ खत्म कराया जा सकता है?
कानूनी तौर पर इसका सीधा जवाब ‘नहीं‘ माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि भूख हड़ताल विरोध का एक वैध और संवैधानिक तरीका है। अदालतें आमतौर पर व्यक्ति को अस्पताल ले जाने की अनुमति देती हैं ताकि उसकी जान बचाई जा सके, लेकिन उसे जबरन खाना खिलाने या अनशन खत्म कराने का आदेश बहुत सीमित परिस्थितियों में ही दिया जाता है।
किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के मामले में भी अदालत ने केवल अस्पताल में भर्ती कराने की अनुमति दी थी, अनशन खत्म करने का निर्देश नहीं दिया था।
क्या डॉक्टर जबरदस्ती खाना खिला सकते हैं?
वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के माल्टा घोषणापत्र के अनुसार डॉक्टरों को मरीज की इच्छा का सम्मान करना चाहिए।
मुख्य बातें:
- मरीज की सहमति के बिना इलाज देना सामान्य स्थिति में उचित नहीं माना जाता।
- जबरन भोजन कराना हर मामले में अनिवार्य नहीं होता।
- अदालतें प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार फैसला करती हैं।
- व्यक्ति की जान बचाने और उसके अधिकारों के बीच संतुलन बनाया जाता है।
Sonam Wangchuk का मामला एक बार फिर यह बहस सामने लेकर आया है कि विरोध प्रदर्शन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। भारतीय कानून शांतिपूर्ण विरोध और भूख हड़ताल को लोकतांत्रिक अधिकार मानता है, लेकिन सरकार को किसी व्यक्ति की जान बचाने के लिए आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने का भी अधिकार है। अंतिम फैसला हर मामले की परिस्थितियों और अदालत के निर्देशों पर निर्भर करता है।ताज़ा खबरों और अपडेट्स के लिए हमें Facebook और Instagram पर फॉलो करें।

