जशपुर | विशेष रिपोर्ट
जब एक छोटा बच्चा पहली बार स्कूल की चौखट पर कदम रखता है, तो अंजान भाषा उसके मन में झिझक और डर पैदा कर देती है। लेकिन जब वही बच्चा अपने घर की बोली, अपनी माटी की खुशबू के साथ पढ़ना शुरू करता है, तो शिक्षा एक उत्सव बन जाती है। इसी सोच को धरातल पर उतारते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के तहत छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से ‘मातृभाषा आधारित शिक्षा’ की एक ऐतिहासिक और अनूठी शुरुआत हुई है।
इस नए शैक्षणिक सत्र से जिले के कुनकुरी और बगीचा विकासखंड के 202 प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा पहली और दूसरी के बच्चों को उनकी अपनी ‘सादरी’ भाषा के माध्यम से क-ख-ग और प्राथमिक गणित सिखाया जाएगा।
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राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) के नेतृत्व में जशपुर जिले में ‘नींव बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम’ की शुरुआत की गई है। इस महत्वाकांक्षी पहल का संचालन जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) जशपुर के मार्गदर्शन में ‘लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन’ (LLF) द्वारा किया जा रहा है।
इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि बच्चों को शुरुआती दौर में ही पढ़ाई बोझ न लगे। जब शिक्षक उनकी अपनी भाषा ‘सादरी’ में बात करेंगे, तो बच्चों का स्कूल आने का डर दूर होगा, कक्षाओं में उनकी भागीदारी बढ़ेगी और सीखने की गति कई गुना तेज़ हो जाएगी।
द्विभाषी पुस्तकें: अपनी संस्कृति से जुड़कर सीखेंगे आधुनिक ज्ञान
इस नए प्रयोग को प्रभावी बनाने के लिए बस्तर, सरगुजा और जशपुर संभाग के कक्षा पहली और दूसरी के विद्यार्थियों के लिए ‘द्विभाषी पाठ्यपुस्तकें’ (Bilingual Textbooks) तैयार की गई हैं। इन पुस्तकों में हिंदी के साथ-साथ स्थानीय सादरी भाषा का बेहतरीन समन्वय किया गया है। किताबों में बच्चों के आसपास के माहौल, लोककथाओं, जंगलों और स्थानीय परिवेश के उदाहरण शामिल किए गए हैं, ताकि बच्चे अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक शिक्षा से सहजता से जुड़ सकें।
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पढ़ाई बीच में छोड़ने (Drop-out) की समस्या पर लगेगा अंकुश
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में मिलने से बच्चों के सोचने और समझने की क्षमता का विकास तेज़ी से होता है। जब बच्चा अपनी बात खुलकर रख पाता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और इससे प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने (ड्राप-आउट) की दर में भी बड़ी गिरावट आएगी।
“राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का मुख्य जोर इस बात पर है कि कम से कम कक्षा 5वीं तक के बच्चों को उनकी मातृभाषा या स्थानीय बोली में ही पढ़ाया जाए। जशपुर में शुरू हुआ यह कार्यक्रम आने वाले समय में पूरे प्रदेश के लिए एक रोल मॉडल साबित होगा।”
— जे.पी. रथ, अपर संचालक, SCERT
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