कुड़ुख भाषा, धुमकुड़िया और समृद्ध विरासत: जानिए मध्य भारत की प्रमुख उरांव जनजाति की सांस्कृतिक पहचान
झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के वनांचल व मैदानी इलाकों में सदियों से रची-बसी उरांव जनजाति अपनी विशिष्ट जीवनशैली, समृद्ध परंपरा और अनूठी सामाजिक व्यवस्था के लिए पहचानी जाती है। कुड़ुख नाम से भी जाना जाने वाला यह समुदाय न केवल मध्य भारत के प्रमुख आदिवासी समूहों में शामिल है, बल्कि अपनी लोकसंस्कृति, लोकगीत-नृत्य और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के चलते एक सशक्त पहचान रखता है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, अकेले झारखंड में ही इस समुदाय की आबादी 17 लाख से अधिक दर्ज की गई थी, जो राज्य के सामाजिक ताने-बाने का एक बड़ा हिस्सा है।
उरांव समाज की सांस्कृतिक रीढ़ उनकी मातृभाषा कुड़ुख है। लोकगाथाओं और मौखिक परंपराओं में जीवित इस भाषा को संरक्षित करने के लिए विकसित की गई ‘तोलोंग सिकी’ लिपि ने इसे आधुनिक दौर में एक मजबूत लिखित आधार दिया है। इसके अलावा समाज की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली ‘धुमकुड़िया’ सामुदायिक जीवन का सबसे नायाब उदाहरण रही है। यह संस्था युवाओं को समाज के रीति-रिवाज, अनुशासन, सामूहिक जिम्मेदारियां और सांस्कृतिक मूल्य सिखाने की एक अनौपचारिक पाठशाला के रूप में काम करती आई है।
प्रकृति पूजा और सामूहिकता इस समुदाय के पर्व-त्योहारों के केंद्र में रहती है। करमा और जदुर जैसे त्योहारों में पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर सामूहिक नृत्य और गायन के जरिए उरांव समाज अपनी आस्था और सामाजिक एकता को प्रदर्शित करता है। वहीं, गांव की पारंपरिक धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था में ‘पाहन’ का स्थान सर्वोच्च होता है, जिनकी अगुआई में सभी पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं। ऐतिहासिक मुड़मा मेला भी इस समुदाय के सामाजिक मिलन और सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।
इतिहास के पन्नों में उरांव समुदाय का योगदान ‘टाना भगत आंदोलन’ के रूप में दर्ज है। सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों के खात्मे से शुरू हुआ यह आंदोलन बाद में महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम का अहम अध्याय बना। वर्तमान में उरांव समाज में धार्मिक विविधता भी देखने को मिलती है; समाज का एक बड़ा वर्ग पारंपरिक ‘सरना’ धर्म को मानता है, तो वहीं कई परिवार ईसाई धर्म से जुड़े हैं। पूजा पद्धतियों में भिन्नता के बावजूद कुड़ुख भाषा, लोकगीत, नृत्य और साझी विरासत आज भी पूरे समुदाय को एक सूत्र में पिरोए हुए है।

