विशेष संवाददाता, नई दिल्ली
देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था से एक बेहद उत्साहजनक और सकारात्मक रिपोर्ट सामने आई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के लागू होने के बाद, भारत में छात्र-शिक्षक अनुपात यानी प्यूपिल-टीचर रेशियो (PTR) में अभूतपूर्व सुधार दर्ज किया गया है। ताज़ा रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, देश का औसत छात्र-शिक्षक अनुपात अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा निर्धारित 30:1 (प्रति तीस छात्रों पर एक शिक्षक) के आदर्श मानक से भी कहीं बेहतर स्थिति में पहुंच चुका है। यह सुधार इस बात का संकेत है कि अब स्कूलों में बच्चों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देना पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है।
प्राथमिक स्तर पर सबसे मजबूत स्थिति: देखें हर स्तर के आंकड़े
रिपोर्ट में स्कूली शिक्षा के अलग-अलग चरणों (विभिन्न स्तरों) पर छात्र-शिक्षक अनुपात की विस्तृत और बेहद मजबूत तस्वीर पेश की गई है:
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फाउंडेशनल स्तर पर स्थिति सबसे शानदार है, जहाँ प्रति 10 छात्रों पर 1 शिक्षक (10:1) उपलब्ध है।
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प्रिपरेटरी स्तर छात्र-शिक्षक का अनुपात 12:1 दर्ज किया गया है।
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मिडिल स्तर की ओर बढ़ने पर यह अनुपात 17:1 है।
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सेकेंडरी स्तर पर प्रति 21 छात्रों पर 1 शिक्षक (21:1) अपनी सेवाएं दे रहा है।
सभी स्तरों पर दर्ज यह अनुपात राष्ट्रीय नीति के 30:1 के घेरे से काफी नीचे है, जो शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिहाज से एक मील का पत्थर माना जा रहा है।
स्कूलों में संक्रमण दर (Transition Rate) में भारी उछाल
कक्षाओं में शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता का सीधा और सकारात्मक असर अब विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखने (रिटेंशन) पर भी साफ दिखाई देने लगा है। जब छात्रों को स्कूल में पर्याप्त शिक्षक मिलते हैं, तो उनके बीच में पढ़ाई छोड़ने (ड्रॉपआउट) की आशंका बेहद कम हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, एक स्तर से दूसरे स्तर में जाने वाले छात्रों की संक्रमण दर (Transition Rate) के आंकड़े निम्नलिखित हैं:
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शुरुआती कक्षाओं से प्रिपरेटरी स्तर पर जाने वाले बच्चों की संक्रमण दर रिकॉर्ड 99.2 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसका मतलब है कि लगभग हर बच्चा अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी कर आगे बढ़ रहा है।
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मिडिल स्कूल पार करके उच्च शिक्षा यानी सेकेंडरी स्तर पर कदम रखने वाले छात्रों की दर भी बढ़कर 88.3 प्रतिशत दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि छात्र-शिक्षक अनुपात में आया यह क्रांतिकारी सुधार और बेहतर होती संक्रमण दर आने वाले समय में देश के भीतर साक्षरता और उच्च शिक्षा के स्तर को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगी। विनियामक और ढांचागत सुधारों के कारण अब भारतीय स्कूल वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को ढालने में सफल हो रहे हैं।



