नई दिल्ली: चीनी की बढ़ती मिठास के बीच कीमतों की कड़वाहट से जूझ रहे आम उपभोक्ताओं के लिए अब प्याज का तीखापन नई मुसीबत बनकर उभरा है। बीते महज एक महीने के भीतर प्याज के थोक भावों में दर्ज की गई करीब 76 फीसदी की अप्रत्याशित तेजी ने न केवल आम आदमी की रसोई का गणित बिगाड़ दिया है, बल्कि सरकार के नीति-नियंताओं के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। खाद्य वस्तुओं के दामों में यह उछाल सीधे तौर पर आम नागरिकों की क्रयशक्ति पर चोट कर रहा है।
दामों में आग लगने के मुख्य कारण
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फसल चक्र और आवक में गिरावट: खरीफ सीजन की बुआई में देरी, मंडियों में कम होती आवक और अगस्त-सितंबर के दौरान पुराने स्टॉक में कमी ने मांग और आपूर्ति के अंतर को बढ़ा दिया है।
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बफर स्टॉक का लक्ष्य अधूरा: सरकार ने बफर स्टॉक के लिए 2 लाख टन प्याज खरीद का लक्ष्य रखा था, लेकिन बेहतर दाम की तलाश में किसानों द्वारा खुले बाजार को प्राथमिकता देने से जुलाई अंत तक महज 1.20 लाख टन ही खरीदा जा सका।
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मौसम की मार: कमजोर मानसून और बेमौसम बारिश की दोहरी मार ने दलहन, गन्ने और प्याज की खड़ी फसलों को खासा नुकसान पहुंचाया है।
जमाखोरी की आशंका और सरकारी चुनौतियां जैसे ही बाजार में आपूर्ति संकट के संकेत मिलते हैं, मुनाफाखोर और जमाखोर सक्रिय हो जाते हैं। यद्यपि सरकार कीमतों को थामने के लिए बफर स्टॉक को बाजार में उतारने की तैयारी कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका प्रभाव कितना व्यापक होगा, यह बड़ा सवाल है। अनुभव बताता है कि जब कीमतें एक बार रफ्तार पकड़ लेती हैं, तो उन्हें फौरन नियंत्रित करना बेहद जटिल हो जाता है।
आगामी त्योहारी सीजन और नीतिगत जरूरतें आने वाले हफ्तों में त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है। यदि समय रहते पुख्ता कदम नहीं उठाए गए, तो सब्जियों, खाद्य तेलों और अन्य आवश्यक राशन की कीमतों में भी भारी उछाल आ सकता है।
सरकार को राहत देने के बजाय रोकथाम की नीति पर काम करने की जरूरत है:
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सख्त निगरानी: खाद्य एवं आपूर्ति विभाग को बाजार में मांग और आपूर्ति का अग्रिम आकलन करना होगा।
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जमाखोरी पर लगाम: मुनाफाखोरों और कृत्रिम किल्लत पैदा करने वालों पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
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व्यापार नीति में संतुलन: आवश्यकतानुसार निर्यात पर कड़े नियंत्रण और बफर स्टॉक के त्वरित वितरण से आम आदमी की थाली को महंगाई के झटके से बचाया जा सकता है।


