देश भर में 1,152 पंचायतें बनीं ‘पंचायत शिक्षण केंद्र’, निर्वाचित प्रतिनिधियों को मिलेगा प्रशिक्षण

देश की पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त, पारदर्शी और सक्षम बनाने के लिए केंद्र सरकार ने अब ‘प्रशिक्षण’ और ‘वित्तीय अनुशासन’ के दोहरे फार्मूले को अपना लिया है। लोकसभा में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सरकार का मुख्य उद्देश्य ग्राम पंचायतों को न केवल आधुनिक तकनीक से जोड़ना है, बल्कि उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों और कर्मचारियों की नेतृत्व क्षमता को भी निखारना है। इसी कड़ी में ‘संशोधित राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान’ (RGSA) के तहत अब तक देश भर में 1,152 ग्राम पंचायतों को ‘पंचायत शिक्षण केंद्रों’ (PLC) के रूप में विकसित किया गया है। ये केंद्र अब ज्ञान साझा करने और व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए एक प्रभावी मंच का कार्य कर रहे हैं, जहां प्रतिनिधि शासन की प्रक्रियाएं, वित्तीय प्रबंधन और सुशासन की अच्छी प्रथाओं को प्रत्यक्ष रूप से सीख रहे हैं।

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क्षमता निर्माण के साथ-साथ सरकार वित्तीय प्रबंधन में अभूतपूर्व पारदर्शिता लाने पर भी जोर दे रही है। मंत्रालय अप्रैल 2020 से ‘ई-ग्रामस्वराज’ पोर्टल का प्रबंधन कर रहा है, जो पंचायतों के वित्तीय कार्यों को योजना बनाने से लेकर भुगतान तक पूरी तरह एकीकृत करता है। इसे पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS) के साथ जोड़ दिया गया है, जिससे ग्राम पंचायतों के लिए विक्रेताओं और सेवा प्रदाताओं को वास्तविक समय में डिजिटल भुगतान करना संभव हो गया है। इसके अतिरिक्त, ‘ऑडिट-ऑनलाइन’ एप्लिकेशन के माध्यम से पंचायत खातों का डिजिटल ऑडिट किया जा रहा है, जिससे सरकारी फंड के दुरुपयोग की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है। यह डिजिटल तंत्र सुनिश्चित करता है कि केंद्रीय वित्त आयोग से मिलने वाली निधियों का पारदर्शी तरीके से उपयोग हो।

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वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2025-26 के दौरान जारी की गई धनराशि और उसके उपयोग के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि राज्यों में फंड की उपयोगिता की गति भिन्न है। सरकार की नीति के अनुसार, राज्यों को अनुदान की किस्तें तभी जारी की जाती हैं जब वे पिछली किस्त के उपयोग का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करते हैं। इस वित्तीय अनुशासन का असर जमीन पर दिख रहा है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने आवंटित धनराशि से अधिक यानी 106 प्रतिशत का उपयोग दर्ज किया है, जो विकास कार्यों की तेज गति को दर्शाता है। वहीं, अन्य राज्यों में उपयोगिता प्रतिशत अलग-अलग है।

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सरकार का मानना है कि पंचायत शिक्षण केंद्रों के माध्यम से मिल रहा प्रशिक्षण और ई-पोर्टल्स के जरिए सुनिश्चित की जा रही वित्तीय पारदर्शिता, दोनों मिलकर ग्रामीण शासन को एक नई दिशा देंगे। जहां प्रशिक्षण निर्वाचित प्रतिनिधियों को बेहतर योजना बनाने और नेतृत्व करने में मदद कर रहा है, वहीं डिजिटल ऑडिट और ई-भुगतान जैसी तकनीकें यह सुनिश्चित कर रही हैं कि जनता का पैसा सीधे और सही काम पर खर्च हो। पंचायती राज मंत्रालय की यह एकीकृत पहल आने वाले समय में ग्राम पंचायतों को न केवल आत्मनिर्भर बनाएगी, बल्कि उन्हें सुशासन की प्रयोगशाला के रूप में भी स्थापित करेगी।

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