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रायपुर, 02 जनवरी 2026
आदिवासी भूमि स्वामित्व से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रकरण में 18 वर्ष बाद न्याय मिला है। संभागायुक्त रायपुर संभाग श्री महादेव कावरे ने खमतराई तहसील एवं जिला रायपुर स्थित भूमि के नामांतरण विवाद में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) रायपुर द्वारा पारित आदेश को विधिसम्मत नहीं मानते हुए निरस्त कर दिया है। साथ ही छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 49 के तहत किया गया प्रत्यावर्तन भी निरस्त कर दिया गया है।

यह अपील छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 44(2) के अंतर्गत श्यामसुंदर सिंह (पिता स्वर्गीय रामनारायण सिंह) एवं शारदा सिंह (पिता रामनारायण सिंह), निवासी भनपुरी रायपुर द्वारा प्रस्तुत की गई थी। अपील अनुविभागीय अधिकारी रायपुर द्वारा 31 जुलाई 2017 को पारित आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी। इस प्रकरण में उत्तरवादी के रूप में प्रवीण कुमार अग्रवाल, निवासी शैलेन्द्र नगर रायपुर को पक्षकार बनाया गया था।

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प्रकरण ग्राम खमतराई स्थित खसरा नंबर 125/2 एवं 125/9 कुल रकबा 0.405 हेक्टेयर भूमि से संबंधित है। अपीलार्थियों का तर्क था कि उक्त भूमि का पूर्व में विधिवत विक्रय आदिवासी गोंड जाति के व्यक्ति के पक्ष में हो चुका था। ऐसे में स्वत्व के अभाव में बाद में की गई बिक्री से उत्तरवादी को कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता।

संभागायुक्त न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि स्वत्व के बिना किया गया विक्रय विधि सम्मत नहीं माना जा सकता और ऐसे विक्रय से क्रेता को कोई वैधानिक लाभ नहीं मिल सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुविभागीय अधिकारी द्वारा प्रकरण को तहसीलदार को प्रत्यावर्तित करना छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 49(3) के प्रावधानों के विपरीत है, क्योंकि उक्त धारा के तहत प्रत्यावर्तन स्पष्ट रूप से वर्जित है।

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सभी दस्तावेजों, तथ्यों और पक्षकारों के तर्कों का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद संभागायुक्त श्री महादेव कावरे ने यह निष्कर्ष निकाला कि अनुविभागीय अधिकारी रायपुर का आदेश विधिसम्मत नहीं है। फलस्वरूप 29 दिसंबर 2025 को खुले न्यायालय में अपील स्वीकार करते हुए अनुविभागीय अधिकारी का आदेश निरस्त कर दिया गया।

यह निर्णय आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक अहम मिसाल माना जा रहा है, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शन मिलेगा।

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