नई दिल्ली/पीआईबी, 21 फरवरी 2026। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज ‘मेडलुमिना 2026: इंटरनेशनल मल्टी स्पेशियलिटी मेडिकल कॉन्फ्रेंस’ के उद्घाटन अवसर पर चिकित्सा जगत में हो रहे क्रांतिकारी बदलावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आधारित उपकरण अब चिकित्सा जांच में मानवीय त्रुटियों और व्यक्तिगत अनुमानों के अंतर को समाप्त कर रहे हैं, जिससे मरीजों को अधिक सटीक और स्पष्ट उपचार मिलना सुनिश्चित होगा। डॉ. सिंह ने उदाहरण देते हुए समझाया कि एआई तकनीक बायोप्सी स्लाइड में कैंसर कोशिकाओं के उन सूक्ष्म समूहों को भी पहचान सकती है जो पैथोलॉजिस्ट की नंगी आँखों से छूट सकते हैं। यह तकनीक न केवल परीक्षण की सटीकता बढ़ा रही है, बल्कि क्लिनिकल डेटा के गहन विश्लेषण से बेहतर उपचार परिणाम भी प्रदान कर रही है।

चिकित्सा विज्ञान के विकास क्रम का उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री ने बताया कि भारत अब जीनोमिक्स और जीन थेरेपी के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा दस लाख लोगों की जीनोम सीक्वेंसिंग का लक्ष्य रखा गया है, जो भविष्य में व्यक्तिगत चिकित्सा पद्धति को पूरी तरह बदल देगा। आने वाले समय में जेनेटिक प्रोफाइलिंग और जीवनशैली के आधार पर हर मरीज के लिए विशिष्ट दवा और उपचार तैयार करना संभव होगा। उन्होंने हीमोफीलिया के लिए सफल जीन थेरेपी और भारत की पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक ‘नैफिथ्रोमाइसिन’ के विकास को देश की बढ़ती वैज्ञानिक क्षमता का प्रमाण बताया। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि आने वाले दशकों में एआई और जीनोमिक इनसाइट्स मिलकर चिकित्सकों को ‘एक ही दवा सबके लिए’ वाले पुराने ढर्रे से बाहर निकालकर सटीक औषधि की ओर ले जाएंगे।

देश में बीमारियों के बदलते स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि जीवनशैली में बदलाव के कारण अब मधुमेह और थायरॉइड जैसी बीमारियाँ किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित न रहकर पूरे देश में फैल गई हैं। विशेष रूप से कम उम्र के युवाओं में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का बढ़ना एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी 40 वर्ष से कम आयु की है, इसलिए विकसित भारत के निर्माण के लिए युवाओं का स्वस्थ रहना अनिवार्य है। अंत में उन्होंने सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग का आह्वान करते हुए कहा कि अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा की तरह अब स्वास्थ्य अनुसंधान के रास्ते भी निजी भागीदारी के लिए खोल दिए गए हैं। सरकारी संस्थानों और निजी डायग्नोस्टिक केंद्रों के मिलन से न्यूक्लियर मेडिसिन और कैंसर उपचार जैसे जटिल क्षेत्रों में भारत तेजी से आत्मनिर्भर बनेगा।

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