बिलासपुर:
हाई कोर्ट ने बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता (एमपीएचडब्ल्यू) पद पर चयन सूची में नाम आने के बावजूद नियुक्ति न देने के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक द्वारा वर्ष 2015 में पारित खारिज आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी अभ्यावेदन को खारिज करते समय सक्षम अधिकारी का यह कानूनी दायित्व है कि वह आदेश में स्पष्ट और ठोस कारण दर्ज करे।
क्या है पूरा मामला?
वर्ष 2012 में स्वास्थ्य विभाग ने एमपीएचडब्ल्यू पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। इसमें मनीष राजपूत, रविशंकर देवांगन और दिनेश सिंह राजपूत सहित चार अभ्यर्थियों ने आवेदन किया। प्रक्रिया पूरी होने के बाद चयन सूची में नाम दर्ज होने के बावजूद उन्हें नियुक्ति पत्र जारी नहीं किए गए।
न्याय पाने के लिए अभ्यर्थियों ने कानूनी लड़ाई लड़ी:
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पहला चरण: अभ्यर्थियों की प्रारंभिक याचिका खारिज हो गई थी।
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रिट अपील: इसके बाद दायर रिट अपील पर 30 अक्टूबर 2014 को डिवीजन बेंच ने अभ्यर्थियों को राज्य सरकार के समक्ष नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी।
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2015 का आदेश: अभ्यर्थियों ने अभ्यावेदन दिया, लेकिन 16 सितंबर 2015 को स्वास्थ्य सेवा के संयुक्त संचालक ने बिना कोई स्पष्ट कारण बताए इसे खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट का रुख और निर्देश
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने माना कि बिना कारण बताए जारी किया गया आदेश विधि सम्मत नहीं है। राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया था कि 14 वर्ष बीत जाने के बाद इस पर पुनर्विचार करना उचित नहीं होगा, जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया।
अदालत ने 2015 के निरस्त आदेश को रद करते हुए मामले को वापस संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं को भेज दिया है। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का समुचित अवसर देते हुए उनके अभ्यावेदन पर नए सिरे से तर्कसंगत और स्पष्ट निर्णय लें।

