“टोटी से टेस्ट ट्यूब तक: छत्तीसगढ़ में अब पानी की ‘डिजिटल कुंडली’ तैयार, एक क्लिक पर दिखेगी शुद्धता।”

रायपुर: जल जीवन मिशन के तहत अब ग्रामीण भारत की प्यास बुझाने के साथ-साथ पानी की ‘शुद्धता’ को लेकर राज्यों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा जारी 2026 के ताज़ा आंकड़ों ने मध्य भारत की एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जहाँ छत्तीसगढ़ बुनियादी ढांचे और विश्वसनीयता के मामले में अपने पड़ोसी राज्यों के लिए एक मिसाल बनकर उभर रहा है।

आंकड़ों की ज़ुबानी: कौन कहाँ खड़ा है?

जब हम छत्तीसगढ़ की सीमाओं से लगे राज्यों—मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखंड—पर नज़र डालते हैं, तो जल परीक्षण की सुविधाओं में बड़ा अंतर दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ ने न केवल लैब की संख्या बढ़ाई है, बल्कि उनकी मान्यता (Accreditation) पर भी ज़ोर दिया है ताकि रिपोर्ट पर जनता का भरोसा बना रहे।

 ओडिशा में लैब की कुल संख्या 160 है, जो छत्तीसगढ़ (78) से दोगुनी है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी संख्या के बावजूद ओडिशा की मात्र 48 लैब ही प्रमाणित हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ ने अपनी कुल लैब में से 60% से अधिक (47 लैब) को राष्ट्रीय मानकों पर मान्यता दिलाकर यह साबित किया है कि वह मात्रा से ज़्यादा गुणवत्ता पर भरोसा करता है। पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश 187 प्रयोगशालाओं के साथ एक बड़े नेटवर्क का संचालन कर रहा है, जिनमें से 155 को मान्यता प्राप्त है। छत्तीसगढ़ अब इसी तर्ज पर अपने ब्लॉक और उप-मंडल स्तर की लैब को तेज़ी से अपग्रेड कर रहा है।  झारखंड में मात्र 39 लैब संचालित हैं। इसकी तुलना में छत्तीसगढ़ का 78 लैब का नेटवर्क यह दर्शाता है कि यहाँ के ग्रामीण इलाकों में पानी की जांच की पहुँच कहीं अधिक व्यापक और सुलभ है।

सिर्फ सरकारी आँकड़े नहीं, अब जनता का अधिकार

इस पूरी व्यवस्था का सबसे आधुनिक पहलू इसका ‘फ्लो’ है। अब पानी की शुद्धता केवल सरकारी फाइलों में बंद नहीं रहती। जेजेएम पोर्टल के ‘सिटीजन कॉर्नर’ ने छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों को यह ताकत दी है कि वे अपने गांव के पानी की टेस्ट रिपोर्ट मोबाइल पर देख सकें। सरकार ने साफ कर दिया है कि छत्तीसगढ़ की इन 78 लैब के दरवाजे आम जनता के लिए खुले हैं; कोई भी व्यक्ति नाममात्र शुल्क देकर अपने घर के पानी की शुद्धता परख सकता है।

स्रोत से लेकर टोटी तक सख्त पहरा

छत्तीसगढ़ में अब पानी की जांच केवल एक औपचारिकता नहीं रही। दिसंबर 2024 की नई गाइडलाइन्स के बाद, विभाग ने ‘सोर्स टू टैप’ (स्रोत से नल तक) निगरानी शुरू की है। इसका मतलब है कि ज़मीन से निकलने वाले पानी से लेकर, ट्रीटमेंट प्लांट और पाइपलाइन के आखिरी सिरे तक, हर स्तर पर सैंपलिंग की जा रही है।

 तुलनात्मक रूप से देखें तो छत्तीसगढ़ ने कम समय में एक ऐसा ‘वाटर क्वालिटी इकोसिस्टम’ तैयार किया है जो न केवल ओडिशा जैसे राज्यों से अधिक विश्वसनीय है, बल्कि मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को भी टक्कर दे रहा है। 47 मान्यता प्राप्त लैब के साथ छत्तीसगढ़ अब मध्य भारत में ‘शुद्ध पेयजल’ का नया हब बनता जा रहा है।

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