बिलासपुर:
छत्तीसगढ़ में सरकारी स्कूलों के संचालन और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में राज्य सरकार को बड़ी राहत मिली है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की विवादास्पद ‘युक्तियुक्तकरण नीति’ (Rationalization Policy) को पूरी तरह सही ठहराते हुए इसे जनहित में बताया है।
क्या है पूरा मामला?
अगस्त 2024 में राज्य सरकार ने प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या को तर्कसंगत बनाने और स्कूलों के बेहतर संचालन के लिए एक निर्देश जारी किया था। इसके तहत, शिक्षक विहीन और एकल शिक्षकीय स्कूलों में ‘अतिशेष’ (Surplus) शिक्षकों को स्थानांतरित करने का प्रावधान किया गया था। इस नीति के क्रियान्वयन का आदेश अप्रैल 2025 में जारी किया गया, जिसका प्रदेश भर के शिक्षक संघों ने कड़ा विरोध किया था।
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिकाएं?
छत्तीसगढ़ विद्यालय शिक्षक कर्मचारी संघ सहित विभिन्न जिलों (दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, कांकेर आदि) के शिक्षकों द्वारा दायर की गई 24 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, **जस्टिस विभु दत्त गुरु** की सिंगल बेंच ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि स्कूलों में शिक्षकों का तर्कहीन और असमान वितरण सुधारना सरकार का एक उचित और जनहितकारी कदम है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ट्रांसफर और पोस्टिंग सरकार का प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र है। न्यायालय ने यह भी साफ कर दिया कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को एक ही स्थान पर जमे रहने का कोई संवैधानिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
इस नीति का मुख्य उद्देश्य राज्य के उन स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधारना है जहाँ या तो शिक्षक नहीं हैं या फिर छात्र संख्या के अनुपात में शिक्षकों की कमी है। सरप्लस शिक्षकों को उन स्कूलों में भेजना सरकार की प्राथमिकता है ताकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के मानदंडों का सही तरीके से पालन हो सके और कोई भी बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित न रहे।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब राज्य सरकार के लिए युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया को और तेजी से लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। इससे प्रदेश के सुदूर और एकल शिक्षक वाले स्कूलों में शैक्षणिक माहौल में सकारात्मक बदलाव आने की उम्मीद है।
*रिपोर्ट: चंद्रकांत शुक्ला, बिलासपुर*



