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नई दिल्ली/रायपुर | 23 मार्च 2026
देश में एलपीजी सिलिंडरों की बढ़ती किल्लत और आपूर्ति के संकट के बीच भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने गैस बुकिंग की प्रक्रिया में एक ऐसा बदलाव किया है जिसने उपभोक्ताओं के साथ-साथ गैस एजेंसी संचालकों को भी हैरान कर दिया है। नए नियमों के मुताबिक, जिन उपभोक्ताओं ने चालू वित्त वर्ष के लिए निर्धारित 12 सिलिंडरों का अपना सालाना कोटा पूरा कर लिया है, उन्हें अब अगले रिफिल के लिए सामान्य तरीके से बुकिंग की सुविधा नहीं मिलेगी। अब ऐसे ग्राहकों को अनिवार्य रूप से ‘हेलो बीपीसीएल’ एप डाउनलोड करना होगा और वहां कंपनी द्वारा पूछे गए कई निजी और घरेलू सवालों के जवाब देने होंगे। इन सवालों में परिवार के सदस्यों की कुल संख्या, घर में आए मेहमानों का विवरण, और क्या घर में कोई शादी, भंडारा या विशेष आयोजन है जैसी जानकारियां शामिल हैं। इन सभी औपचारिकताओं और सवालों के संतोषजनक जवाब देने के बाद ही सिस्टम सिलेंडर की नई बुकिंग स्वीकार करेगा।
रविवार से अचानक लागू हुए इस नियम ने जमीन पर भारी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि इसकी पूर्व जानकारी न तो गैस एजेंसी संचालकों को थी और न ही आम जनता को। सोमवार सुबह से ही जब बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं ने अपने मोबाइल फोन से पारंपरिक तरीके (IVR या SMS) से बुकिंग की कोशिश की और वे असफल रहे, तो वे भागते हुए गैस एजेंसियों के दफ्तर पहुँचे। चौंकाने वाली बात यह है कि एजेंसी स्टाफ को भी इस बदलाव की भनक नहीं थी और जब संचालकों ने कंपनी के उच्च अधिकारियों से संपर्क किया, तब जाकर इस नई और जटिल प्रक्रिया का खुलासा हुआ। ऑल इंडिया एलपीजी डिस्टि्रब्यूटर्स एसोसिएशन के अनुसार, 12 सिलिंडरों का कोटा खत्म होने के बाद अब अतिरिक्त गैस की जरूरत को साबित करने के लिए एप के जरिए यह सर्वे अनिवार्य कर दिया गया है।
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बीपीसीएल के इस कदम से सबसे ज्यादा परेशानी उन बुजुर्गों, ग्रामीणों और गरीब वर्ग के उपभोक्ताओं को होने वाली है जो आज भी स्मार्टफोन की जगह सामान्य कीपैड वाला फोन इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल साक्षरता की कमी और स्मार्टफोन खरीदने की असमर्थता के बीच, घर बैठे गैस बुकिंग की पुरानी सहूलियत अब ऐसे लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। सवालों के जवाब देने की इस कठिन प्रक्रिया के कारण अब उपभोक्ताओं को बार-बार गैस एजेंसियों के चक्कर काटने पड़ सकते हैं, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदिर्शता लाने के नाम पर लागू किए गए इन नियमों ने आम आदमी की रसोई के बजट के साथ-साथ उनकी मानसिक परेशानी भी बढ़ा दी है, खासकर ऐसे समय में जब शादियों और त्योहारों का सीजन नजदीक है।


