CG NOW :लोकल से ग्लोबल तक का सफर: डिजिटल मीडिया में ऐतिहासिक छलांग: 1.9 करोड़ इंटरैक्शन के साथ भरोसे का नया मानक

लेख: फैज़ान अशरफ

जशपुर: विविध तापमान की गोद में पनपती सुनहरी खेती की नई इबारत जशपुर जिला अपनी भौगोलिक विविधता और बदलते तापमान के कारण छत्तीसगढ़ का एक ऐसा विशिष्ट अंचल है, जहाँ प्रकृति ने खुद खेती का एक आदर्श खाका तैयार किया है।

जिले के अलग-अलग ब्लॉकों में शून्य से पैंतालीस डिग्री तक का तापीय अंतर इसे केवल एक जिला नहीं, बल्कि एक समृद्ध ‘एग्रो-क्लाइमैटिक जोन’ बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तापीय विविधता को वैज्ञानिक आधार देकर सरकार एक स्पष्ट नीति के साथ आगे बढ़े, तो जशपुर राज्य का पहला ऐसा ‘मॉडल कृषि जिला’ बन सकता है जहाँ सेब से लेकर खजूर तक एक साथ उगाए जा सकें।

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जशपुर की इस यात्रा की शुरुआत इसके सबसे ऊंचे और ठंडे अंचलों, सन्ना और पंडरापाठ से होती है। सर्दियों में शून्य डिग्री तक का स्पर्श पाने वाले ये क्षेत्र अपनी दोमट मिट्टी और बेहतर जल निकास के कारण ‘छत्तीसगढ़ के कश्मीर’ के रूप में उभर सकते हैं। यहाँ की जलवायु सेब, नाशपाती, कीवी और स्ट्रॉबेरी जैसे शीतोष्ण फलों के साथ-साथ जटामांसी और अश्वगंधा जैसी बेशकीमती औषधियों के लिए वरदान है। वर्तमान में नाश पाती, स्ट्राबेरी, खेती की जा रही है, सेब के पौधे लगाय गए है

जैसे-जैसे हम ऊंचाइयों से नीचे उतरकर कुनकुरी, मनोरा और दुलदुला के मध्य क्षेत्रों की ओर बढ़ते हैं, तापमान का पारा 10 से 25 डिग्री के बीच एक नया संतुलन बनाता है। यह क्षेत्र जशपुर की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जहाँ नमी धारण करने वाली मिट्टी लीची, संतरा, अनार और केला जैसे फलों को जीवन देती है।

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यहाँ न केवल फलों का बगीचा फल-फूल सकता है, बल्कि हल्दी, अदरक और तेजपत्ता जैसे मसालों की खेती के जरिए किसानों की आय को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

मैदानी और निचले इलाकों, जैसे कुनकुरी और नारायणपुर के कुछ हिस्सों में, जहाँ पारा 25 से 35 डिग्री के बीच रहता है, वहां उष्णकटिबंधीय खेती की अपार संभावनाएं छिपी हैं। यहाँ का वातावरण अनानास, पपीता और चीकू काजू जैसे फलों के लिए अनुकूल है, तो वहीं एलोवेरा और सफेद मूसली जैसी औषधीय फसलें इस क्षेत्र को एक नया औद्योगिक आयाम दे सकती हैं।

जशपुर का सफर फरसाबहार और पत्थलगांव के उन गर्म इलाकों पर जाकर पूरा होता है, जहाँ ग्रीष्मकाल में तापमान 45 डिग्री तक पहुँच जाता है। इन क्षेत्रों की हल्की बलुई मिट्टी और शुष्क जलवायु उन फसलों के लिए आदर्श है जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है। यहाँ खजूर, सीताफल, बेर काजू और सहजन (मुनगा) जैसी फसलें न केवल जीवित रह सकती हैं, बल्कि भरपूर उत्पादन देकर इस इलाके की तस्वीर बदल सकती हैं।

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इन संभावनाओं को हकीकत में बदलने के लिए अब एक ठोस सरकारी विज़न की दरकार है। सबसे पहले, ब्लॉकवार तापमान और मिट्टी का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर एक विस्तृत ‘फसल मानचित्र’ (Crop Map) तैयार किया जाना चाहिए। सरकारी योजनाओं का केंद्र केवल खेती तक सीमित न होकर गुणवत्तापूर्ण नर्सरी के विकास, मसाला मिशन के प्रोत्साहन और स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग इकाइयों की स्थापना पर होना चाहिए।

यदि शासन-प्रशासन इस तापीय विविधता को अपनी विकास नीति का मुख्य हिस्सा बना ले, तो जशपुर न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे मध्य भारत में फल, औषधि और मसालों का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा। यह न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित करेगा, बल्कि जशपुर की पहचान एक उन्नत और आत्मनिर्भर कृषि जिले के रूप में वैश्विक पटल पर स्थापित होगी।

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