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नई दिल्ली | 20 फरवरी 2026

भारत सरकार ने अपनी डिजिटल सुरक्षा रणनीति में एक युगांतकारी परिवर्तन करते हुए ‘आधार’ प्रणाली को दुनिया के सबसे उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सुरक्षा कवच से लैस कर दिया है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा पेश की गई इस “अदृश्य ढाल” का उद्देश्य केवल डेटा को सुरक्षित करना नहीं, बल्कि एक ऐसी त्रुटिहीन पहचान प्रणाली स्थापित करना है, जिसे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सके। यह तकनीक एक अरब से अधिक भारतीयों के सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए चौबीसों घंटे काम कर रही है।

तकनीकी महाशक्ति: अरबों गणनाएं और स्वदेशी नवाचार

इस नई प्रणाली की रीढ़ ‘जनसंख्या-स्तरीय डेटा डुप्लीकेशन’ (Population-level de-duplication) तकनीक है। प्रत्येक नए आधार नामांकन या अपडेट के दौरान, सिस्टम को यह सुनिश्चित करना होता है कि आवेदक का डेटा पहले से मौजूद डेटाबेस में किसी अन्य नाम या पहचान से दर्ज तो नहीं है। इस प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए UIDAI ने अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT), हैदराबाद के साथ मिलकर विशेष स्वदेशी एआई मॉडल विकसित किए हैं। ये मॉडल उंगलियों के निशान (Fingerprints), चेहरे की पहचान (Face ID) और आंखों की पुतली (Iris) के सूक्ष्म मिलान में माहिर हैं।

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इस विशाल कार्य को संभव बनाने के लिए NVIDIA DGX जैसे उच्च-प्रदर्शन वाले सुपरकंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग किया जा रहा है। जब भी कोई नागरिक अपना विवरण अपडेट करता है, तो यह सिस्टम बैकएंड पर एक ही समय में अरबों जटिल गणनाएं करता है। यह त्वरित कंप्यूटिंग सुनिश्चित करती है कि डेटा प्रोसेसिंग में लगने वाला समय न्यूनतम हो और सटीकता शत-प्रतिशत बनी रहे।

धोखाधड़ी पर लगाम: मेटाडेटा और डिजीलॉकर का एकीकरण

अक्सर देखा गया है कि नामांकन के समय फर्जी या हेरफेर किए गए दस्तावेजों का सहारा लिया जाता है। इस खतरे को भांपते हुए UIDAI ने ‘स्मार्ट दस्तावेज़ सत्यापन’ प्रणाली लागू की है। अब एआई केवल कागजों को स्कैन नहीं करता, बल्कि ‘अर्थ संबंधी विश्लेषण’ (Semantic Analysis) के जरिए दस्तावेजों के मेटाडेटा की गहराई से जांच करता है। यह सिस्टम सीधे डिजीलॉकर (DigiLocker) के एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API) से जुड़ा है, जिससे किसी भी दस्तावेज की प्रामाणिकता को उसके मूल जारीकर्ता स्रोत से ही सत्यापित कर लिया जाता है। यदि किसी दस्तावेज में रत्ती भर भी छेड़छाड़ पाई जाती है, तो सिस्टम उसे शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर देता है।

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नागरिकों के लिए क्या बदलेगा?

इस “अदृश्य ढाल” का सबसे बड़ा लाभ आम आदमी को मिलने वाली सेवा की गुणवत्ता में दिखेगा। पहले बायोमेट्रिक मिलान और दस्तावेज़ सत्यापन में लंबा समय लगता था, लेकिन अब एआई इन्फरेंसिंग के कारण यह प्रक्रिया अत्यधिक तेज हो गई है। कई राज्यों में इस उन्नत प्रणाली का परीक्षण सफल रहा है और अब इसे राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू करने की तैयारी अंतिम चरण में है। यह पहल न केवल आधार की डेटा विश्वसनीयता को बढ़ाती है, बल्कि बैंकिंग, राशन और अन्य सरकारी योजनाओं के वितरण में होने वाली लीकेज को भी पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह एआई रक्षा प्रणाली वैश्विक स्तर पर डिजिटल पहचान प्रबंधन के लिए एक नया ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ स्थापित करेगी। यह स्पष्ट संदेश है कि तकनीक के इस युग में भारत अपने नागरिकों की निजता और पहचान की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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