संपादकीय:
छत्तीसगढ़ में सहायक शिक्षक भर्ती 2023 का मामला अब एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ न्याय की गुहार लगाने वाले युवा जेल की सलाखों के पीछे आमरण अनशन करने को मजबूर हैं। 59 दिनों से चल रहा डीएड (D.Ed) प्रशिक्षित अभ्यर्थियों का यह आंदोलन न केवल प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था, बल्कि सरकारी संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। जिस उम्र में इन युवाओं को स्कूलों में बच्चों का भविष्य गढ़ना चाहिए था, उस उम्र में वे अपनी नियुक्ति के लिए अंगारों पर चलने और जेल जाने को विवश हैं।
विवाद की जड़ और कानूनी पेच
इस पूरे विवाद के केंद्र में डीएड बनाम बीएड की कानूनी लड़ाई है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट रुख के बावजूद कि प्राथमिक शिक्षा के लिए डीएड प्रशिक्षित ही अनिवार्य योग्यता रखते हैं, अभ्यर्थियों का आरोप है कि उनकी जगह बीएड वालों को नियुक्त किया गया। अदालती आदेशों के बाद भी 2300 पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया का अटकना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा करता है।
आश्वासन की राजनीति और वित्तीय बहाने
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ सरकार शिक्षा को प्राथमिकता देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ‘वित्तीय कारणों’ का हवाला देकर पात्र उम्मीदवारों की नियुक्तियां रोकी जा रही हैं। अभ्यर्थियों का यह कहना तर्कसंगत लगता है कि यदि पद रिक्त हैं और योग्य उम्मीदवार उपलब्ध हैं, तो बजट की कमी का तर्क न्यायोचित नहीं हो सकता। विशेष रूप से अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए रिक्त 1600 से अधिक पद यह दर्शाते हैं कि आदिवासी युवाओं के रोजगार और शिक्षा के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।
लोकतांत्रिक विरोध और प्रशासनिक रवैया
18 फरवरी को प्रदर्शनकारियों का अंगारों पर चलना उनकी हताशा और चरम मानसिक पीड़ा का परिचायक है। लोकतंत्र में संवाद के रास्ते हमेशा खुले होने चाहिए, लेकिन यहाँ संवाद की जगह आश्वासन और अंततः गिरफ्तारी ने ले ली है। जेल के भीतर 45 महिलाओं समेत 125 अभ्यर्थियों का आमरण अनशन प्रशासन के लिए ‘खतरे की घंटी’ होना चाहिए। किसी भी अप्रिय स्थिति की जिम्मेदारी सीधे तौर पर शासन और विभाग की होगी।



