नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में दिग्गज कंपनी ओपनएआई (OpenAI) की नवीनतम स्टडी ने भारत में तकनीक के इस्तेमाल को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत ओपनएआई के लिए दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है, जहां हर हफ्ते 100 मिलियन (10 करोड़) से अधिक एक्टिव यूजर्स हैं। हालांकि, रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू ‘एआई कैपेबिलिटी गैप’ है, जो यह दर्शाता है कि एआई का फायदा देशभर में समान रूप से नहीं पहुंच रहा है।
क्या है ‘एआई कैपेबिलिटी गैप’?
ओपनएआई की सीईओ (एप्लीकेशन्स) फिजी सिमो (Fidji Simo) ने इस रिपोर्ट में ‘एआई कैपेबिलिटी गैप’ को परिभाषित किया है। इसका सीधा मतलब एआई मॉडल्स की असली क्षमता और हमारे द्वारा किए जा रहे वास्तविक उपयोग के बीच का अंतर है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में चैटजीपीटी के लगभग 50% यूजर्स सिर्फ 10 बड़े शहरों में केंद्रित हैं, जबकि इन शहरों की आबादी देश की कुल आबादी का मात्र 10% है। ओपनएआई ने वर्ष 2026 को इसी गैप को भरने का साल माना है।
कोडिंग में अव्वल, पर पहुंच में असंतुलन
भारत कोडिंग, डेटा एनालिसिस और रीजनिंग जैसे क्षेत्रों में दुनिया के एडवांस्ड देशों की कतार में खड़ा है। बेंगलुरु, हैदराबाद, दिल्ली और चेन्नई जैसे टेक हब्स में एआई कोडिंग टूल्स (CodeX) का इस्तेमाल लॉन्च के दो हफ्तों में ही 4 गुना बढ़ गया। लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी के मुकाबले भारत में एआई का उपयोग कुछ विशिष्ट क्षेत्रों तक ही सीमित है।
छोटे राज्यों ने शिक्षा और स्वास्थ्य में मारी बाजी
रिपोर्ट का एक सुखद पहलू यह है कि कम विकसित माने जाने वाले राज्यों में एआई का रचनात्मक उपयोग ज्यादा हो रहा है. असम, ओडिशा, मणिपुर, त्रिपुरा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में एआई का उपयोग शिक्षा के लिए सबसे अधिक हो रहा है। असम में चैटजीपीटी के 22% मैसेज पढ़ाई-लिखाई से जुड़े होते हैं, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और केरल में लोग स्वास्थ्य संबंधी सवालों के लिए एआई पर भरोसा कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में हर 10 में से 1 सवाल हेल्थकेयर से जुड़ा होता है।
चुनौती: बराबरी का अधिकार
OpenAI के मैनेजिंग डायरेक्टर (इंटरनेशनल) ओलिवर जे का कहना है कि एआई को ‘इक्वलाइजर’ (बराबरी लाने वाला) माना जाता है, लेकिन यदि यह सिर्फ बड़े शहरों के डेवलपर्स तक सीमित रहा, तो यह उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इस अंतर को मिटाने के लिए बेहतर एक्सेस और स्किल डेवलपमेंट की तत्काल आवश्यकता है। भारत की विशाल युवा आबादी इस डिजिटल खाई को पाटने की सबसे बड़ी चाबी साबित हो सकती है।



