अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा की महत्वपूर्ण बैठक अंबिकापुर में संपन्न
फैजान अशरफ
छत्तीसगढ़
कभी धान के खेतों में पानी के साथ मुंगरी मछली भी स्वाभाविक रूप से दिखाई देती थी लेकिन अब उसकी मौजूदगी लगभग खत्म हो चुकी है। खेतों से उसका गायब होना पारंपरिक खेती के संतुलन और जैव विविधता पर गहराते संकट की ओर इशारा करता है।
बरसात की पहली बारिश के साथ कभी धान के खेतों में एक अलग सी हलचल दिखती थी। पानी से भरे खेतों और मेड़ों के आसपास मुंगरी मछली की फुर्तीली चाल गांव के जीवन का हिस्सा हुआ करती थी। आज वही खेत हैं पानी भी है लेकिन मुंगरी दिखाई नहीं देती। यह बदलाव सिर्फ एक मछली के लुप्त होने की कहानी नहीं है बल्कि पारंपरिक खेती और खेतों की जैव विविधता के बिगड़ते संतुलन की गंभीर चेतावनी है।
मुंगरी मछली खेतों के प्राकृतिक तंत्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी रही है। यह खेतों में पनपने वाले कीट पतंगों और मच्छरों के लार्वा को खाकर फसलों को प्राकृतिक सुरक्षा देती थी। इसकी मौजूदगी से रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम रहती थी और मिट्टी व पानी दोनों सुरक्षित रहते थे। मुंगरी के गायब होते ही यह प्राकृतिक चक्र टूट गया है और खेत धीरे धीरे अपनी जीवंतता खोते जा रहे हैं।
खेती में आए बदलावों ने सबसे पहले मुंगरी जैसी संवेदनशील प्रजातियों को प्रभावित किया। रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग ने खेतों के पानी को नुकसान पहुंचाया। इसके साथ ही परंपरागत तालाबों का पाटना और खेतों से पानी का तेजी से निकास होने लगा। पहले बारिश का पानी लंबे समय तक खेतों में ठहरता था जिससे मुंगरी को पनपने का अवसर मिलता था। अब पानी जल्दी निकल जाता है और जीवन को बढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता।
ग्रामीण बुजुर्ग बताते हैं कि कभी मुंगरी गांवों में आम मछली हुआ करती थी। बच्चे बरसात में खेतों के किनारे इसे पकड़ते थे और कई घरों में इसे सादगी से पकाया जाता था। आज हालात यह हैं कि नई पीढ़ी ने मुंगरी को केवल किस्सों में सुना है। खेतों से जुड़ी यह स्मृति धीरे धीरे खत्म होती जा रही है।
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मुंगरी की संख्या घटने का असर अब बाजार में भी साफ नजर आने लगा है। इसकी मांग पहले जैसी बनी हुई है लेकिन उपलब्धता लगभग खत्म हो चुकी है। अगर कहीं से मुंगरी बाजार में पहुंच भी जाती है तो हाथों हाथ बिक जाती है। जो मछली कभी सहज रूप से मिल जाती थी वह अब दुर्लभ हो चुकी है।
कमी का असर कीमतों पर भी पड़ा है। मुंगरी अब 600 से 700 रुपये किलो तक बिक रही है। इसके बावजूद यह आसानी से सुलभ नहीं है। कई बार लोग सिर्फ सुनते हैं कि मुंगरी आई थी लेकिन खरीदने से पहले ही खत्म हो जाती है। बढ़ती कीमत दरअसल उस खामोश संकट का संकेत है जो खेतों में गहराता जा रहा है।
पर्यावरण और मत्स्य विशेषज्ञ मानते हैं कि मुंगरी का गायब होना केवल बाजार से जुड़ा विषय नहीं है। यह खेतों की जैव विविधता के कमजोर होने और पारंपरिक खेती के ढांचे के टूटने का साफ संकेत है। अगर रासायनिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल यूं ही चलता रहा तो मुंगरी के साथ साथ खेतों से जुड़े कई अन्य जीव भी विलुप्त हो सकते हैं।
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अब भी उम्मीद बाकी है। जैविक खेती को बढ़ावा देकर रसायनों का सीमित उपयोग किया जाए और खेतों में पानी को कुछ समय तक ठहरने दिया जाए तो मुंगरी की वापसी संभव है। मुंगरी का लौटना केवल एक मछली की वापसी नहीं होगी बल्कि खेतों में फिर से जीवन की हलचल और पारंपरिक खेती के संतुलन की वापसी होगी।


