नई दिल्ली: केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के तहत पेयजल और स्वच्छता विभाग (डीडीडब्ल्यूएस) ने आज ‘सुजल ग्राम संवाद’ के चौथे संस्करण का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इस अनूठी पहल के माध्यम से 5 राज्यों और एक केंद्र-शासित प्रदेश की 6 ग्राम पंचायतों के हजारों ग्रामीणों ने अपनी स्थानीय बोलियों में संवाद करते हुए जल प्रबंधन के जमीनी अनुभवों को साझा किया। वर्चुअल माध्यम से आयोजित इस कार्यक्रम में करीब 2,000 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिसमें ग्राम पंचायत प्रतिनिधि, स्वयं सहायता समूह, महिलाएं, युवा और प्रशासनिक अधिकारी एक साथ आए। इस संवाद का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण समुदायों के नेतृत्व में जल व्यवस्था को मजबूत करना और एक गांव की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को दूसरे गांवों तक पहुँचाना है।

डीडीडब्ल्यूएस के सचिव श्री अशोक के.के. मीणा ने कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि जल जीवन मिशन के तहत बुनियादी ढांचा तैयार होने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती इसके निरंतर संचालन और रखरखाव की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पानी की आपूर्ति अब पूरी तरह से स्थानीय जिम्मेदारी है, जिसे ग्राम पंचायतों और ‘ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों’ (वीडब्ल्यूएससी) को पूरी तरह अपने हाथ में लेना होगा। इसी दिशा में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ग्राम पंचायतों द्वारा वार्षिक ‘जल सेवा आकलन’ रिपोर्ट ग्राम सभा के समक्ष प्रस्तुत करने की प्रक्रिया भी तेज की जा रही है। साथ ही, उन्होंने घोषणा की कि आगामी 8 से 22 मार्च तक राष्ट्रव्यापी ‘जल महोत्सव’ मनाया जाएगा, जिसका उद्देश्य जल परिसंपत्तियों का औपचारिक हस्तांतरण और गुणवत्ता परीक्षण को मजबूत बनाना है।

संवाद के दौरान देश के अलग-अलग कोनों से प्रेरणादायक कहानियां सामने आईं। उत्तरी त्रिपुरा के पश्चिम दमचेरा के ग्रामीणों ने बंगाली में बताया कि कैसे पाइपलाइन के जरिए नल का पानी पहुंचने से जलजनित बीमारियों में भारी कमी आई है। वहीं पुडुचेरी के सेदेरापेट गांव ने शत-प्रतिशत नल कनेक्शन का लक्ष्य हासिल कर एक कुशल शिकायत निवारण तंत्र विकसित कर लिया है। तेलंगाना के पुलिमामिडी गांव ने भी स्कूलों और आंगनवाड़ियों तक सुरक्षित पानी पहुंचाकर अपनी सफलता की कहानी साझा की। अरुणाचल प्रदेश का न्गोपोक गांव जिले की पहली ऐसी पंचायत बन गया है जहां चौबीसों घंटे विश्वसनीय जल आपूर्ति सुनिश्चित की गई है और इसके रखरखाव के लिए समुदाय स्वयं मासिक शुल्क भी एकत्र कर रहा है।

मेघालय और केरल के अनुभव भी इस मिशन की व्यापकता को दर्शाते हैं। मेघालय के पहाड़ी क्षेत्रों में गुरुत्वाकर्षण आधारित वितरण प्रणाली ने महिलाओं के सिर से पानी ढोने का बोझ कम किया है, तो कोझिकोड (केरल) की कुन्नुम्मल पंचायत ने गर्मियों में टैंकरों पर अपनी निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। समापन के दौरान मिशन निदेशक श्री कमल किशोर सोआन ने इन सभी प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ‘सुजल ग्राम संवाद’ जैसे मंच न केवल उपलब्धियों को दिखाने के लिए हैं, बल्कि चुनौतियों पर खुलकर चर्चा करने का भी एक जरिया हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि समुदायों की यह सक्रिय भागीदारी भारत के हर घर तक निरंतर स्वच्छ पेयजल सुनिश्चित करने के सपने को साकार करेगी।

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