मार्च 2026: आस्था और उल्लास का महीना, होली से लेकर चैत्र नवरात्रि तक त्योहारों की धूम

रांची | विशेष रिपोर्ट

छोटा नागपुर यह क्षेत्र झारखंड के पलामू, रांची, हजारीबाग और सिंहभूम से शुरू होकर पश्चिम की ओर छत्तीसगढ़ के जशपुर, सरगुजा और रायगढ़ की पहाड़ियों तक फैला हुआ है। की पावन धरती पर जब फाल्गुन की विदाई होती है और चैत्र का आगमन होता है, तो पूरी प्रकृति एक नव-वधू की तरह सज जाती है। यह वह समय होता है जब सखुआ (साल) के पेड़ों पर सफेद और सुनहरे फूलों की बहार आती है और हवा में एक भीनी-भीनी सोंधी खुशबू घुल जाती है। इसी सुहावने मौसम में आदिवासी समाज का सबसे बड़ा और गौरवशाली पर्व ‘सरहुल’ मनाया जाता है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के प्रति उस अटूट प्रेम का उत्सव है, जो सदियों से उनकी पहचान रहा है। सरहुल का अर्थ ही है ‘साल वृक्ष की पूजा’, जो यह संदेश देता है कि मानव जीवन का अस्तित्व पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है।

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इस महापर्व की शुरुआत एक अत्यंत सुंदर और आध्यात्मिक परंपरा के साथ होती है, जिसे धरती माता और सूर्य देव के विवाह के रूप में देखा जाता है। आदिवासी समुदाय का मानना है कि चैत्र के इस महीने में जब सूर्य की किरणें धरती को ऊष्मा प्रदान करती हैं, तो यह उनके मिलन का समय होता है। इसी मिलन के बाद धरती अन्न उपजाने के लिए तैयार होती है। गांव के मुख्य पुजारी, जिन्हें ‘पहन’ कहा जाता है, सरना स्थल (पूजा स्थल) पर जाकर विधिवत अनुष्ठान करते हैं। पूजा के दौरान सखुआ के फूलों का विशेष महत्व होता है, जिन्हें देवताओं को अर्पित करने के बाद प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। ग्रामीण इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं क्योंकि बिना इस पूजा के वे नई फसल या जंगल के नए फलों का सेवन नहीं करते।

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सरहुल के दौरान एक और दिलचस्प और वैज्ञानिक परंपरा देखने को मिलती है, जो पाहन द्वारा की जाने वाली मानसून की भविष्यवाणी है। पूजा स्थल पर पानी से भरे मिट्टी के दो घड़े रखे जाते हैं और अगले दिन पाहन बड़ी बारीकी से पानी के स्तर की जांच करते हैं। यदि घड़ों में पानी का स्तर स्थिर रहता है, तो यह अच्छी बारिश और भरपूर फसल का संकेत माना जाता है। यदि पानी कम होता है, तो सूखे की चेतावनी दी जाती है। यह प्राचीन ज्ञान आज के आधुनिक मौसम विज्ञान को भी चुनौती देता है और ग्रामीणों के लिए आने वाले कृषि वर्ष का आधार बनता है।

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उत्सव की असली रंगत तब देखने को मिलती है जब मांदल और नगाड़ों की गूंज से पूरा झारखंड गुंजायमान हो उठता है। हज़ारों की संख्या में आदिवासी भाई-बहन अपने पारंपरिक लाल और सफेद परिधानों में सजकर सड़कों पर उतर आते हैं। ‘जदुर’ नाच की लय पर जब हजारों कदम एक साथ थिरकते हैं, तो ऐसा लगता है मानो पूरी धरती उनके साथ झूम रही हो। पुरुषों के हाथों में नगाड़े और महिलाओं के जूड़ों में सखुआ के फूल इस दृश्य को और भी मनमोहक बना देते हैं। यह सामूहिकता का वह अनूठा संगम है जहाँ अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है और पूरा समाज एक सुर में प्रकृति के गीत गाता है।

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अंततः, सरहुल हमें एक बहुत बड़ा वैश्विक संदेश देता है। ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण विनाश की समस्याओं से जूझ रही है, सरहुल का यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि पेड़ों की रक्षा और प्रकृति का सम्मान ही मानवता का भविष्य सुरक्षित रख सकता है। पूजा के पश्चात परोसा जाने वाला ‘सूड़ी’ का प्रसाद और आपसी मेल-मिलाप इस बात का प्रमाण है कि आदिवासियों की संस्कृति उदारता और प्रेम पर टिकी है। सरहुल केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की एक शानदार जीवनशैली का प्रदर्शन है।

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