महुआ,सरई के फूल और आम के बौर की रसीली खुशबू से जंगल बना कुदरत का असली मयखाना!

रायपुर:

छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ तो कहा ही जाता है, लेकिन यहाँ की धरा अपनी कोख में ऐसे बेशकीमती खजाने भी छुपाए हुए है, जिसकी चमक के आगे महंगे से महंगे पकवान फीके पड़ जाते हैं।

न मलाई, न पनीर, कुदरत का ‘सुपरफूड’:देशी तड़का, सूप और सुकटी में छिपा है सेहत का खजाना।” आखिर क्यों दीवाने हैं इसके लिए शहर और गाँव ?

इन दिनों प्रदेश के बाजारों में एक ऐसी ‘हरी सब्जी’ की एंट्री हुई है, जिसकी कीमत सुनकर अच्छे- अच्छों के पसीने छूट रहे हैं। हम बात कर रहे हैं— ‘बोहार भाजी’ की, जो इस वक्त मटन और चिकन से भी कहीं ज्यादा ऊंचे दामों पर बिक रही है।

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कुदरत का ‘लिमिटेड एडिशन’ तोहफा

बोहार भाजी कोई साधारण साग-सब्जी नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़िया संस्कृति और स्वाद की एक गहरी भावना है। जैसे बच्चों को गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार रहता है, वैसे ही यहाँ के खान-पान के शौकीनों को साल भर बोहार के खिलने की प्रतीक्षा रहती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरे साल में मात्र 15 से 20 दिनों के लिए ही उपलब्ध होती है। अगर आप चूक गए, तो फिर अगले साल का लंबा इंतज़ार ही एकमात्र विकल्प है।

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क्यों है यह ‘महंगी और जादुई’?

बाजार में इसकी कीमत ₹800 से लेकर ₹1200 प्रति किलो तक पहुँच रही है। इसके इतना महंगा होने के पीछे कई ठोस कारण हैं:
बोहार के ऊंचे और विशाल पेड़ों से इन कोमल कलियों को तोड़ना जान जोखिम में डालने जैसा काम है। ग्रामीण सुबह-सुबह इन पेड़ों पर चढ़कर बड़ी मशक्कत से इन्हें इकट्ठा करते हैं।

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जानकारों और बुजुर्गों की मानें तो बोहार भाजी औषधीय गुणों की खान है। इसमें भरपूर मात्रा में न्यूट्रिशन प्रॉपर्टीज होती हैं, जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखती हैं और शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देती हैं।
वास्तव में जिसे हम भाजी कहते हैं, वह बोहार के फूल की ‘कच्ची कलियां’ होती हैं। अगर इन्हें सही समय पर न तोड़ा जाए, तो ये सफेद फूल बन जाती हैं और बाद में इनसे ‘गोंदी’ या ‘लसोड़ा’ जैसा फल बनता है, जिसका उपयोग चटपटा अचार बनाने में होता है।

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स्वाद ऐसा कि शाही पकवान भी शरमा जाए

छत्तीसगढ़ के पारंपरिक चूल्हों पर जब बोहार भाजी को दही या मही (मट्ठा) और चने की दाल के साथ धीमी आंच पर पकाया जाता है, तो इसकी सोंधी खुशबू पूरे मोहल्ले को बता देती है कि आज घर में कुछ खास बना है। इसका बेमिसाल ज़ायका किसी भी मांसाहारी व्यंजन को कड़ी टक्कर देता है।

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बोहार भाजी महज़ एक सब्जी नहीं, बल्कि प्रकृति का वह वरदान है जो यह याद दिलाता है कि सबसे सात्विक और शुद्ध चीज़ें ही सबसे कीमती होती हैं।

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क्या आपने इस सीज़न की पहली बोहार भाजी का स्वाद चखा? आपके इलाके में इसे किस नाम से पुकारा जाता है? हमें कमेंट में अपना अनुभव ज़रूर बताएं!

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सरोजनी डाहिरे ने कहा कि “जिसने साल में एक बार बोहार भाजी का स्वाद नहीं लिया, उसने छत्तीसगढ़ की असली जमीन और संस्कृति के स्वाद को अधूरा ही छोड़ा है।”

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