नई दिल्ली: आश्विन मास में पड़ने वाला पावन शक्ति पर्व ‘शारदीय नवरात्र’ इस साल 11 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा है। जगत जननी मां दुर्गा की आराधना का यह महापर्व 20 अक्टूबर को प्रतिमा विसर्जन और विजयादशमी (दशहरा) के साथ संपन्न होगा। मिथिला पंचांग के अनुसार, तिथियों के विशेष संयोग के चलते इस बार अष्टमी तिथि का प्रभाव दो दिन देखने को मिलेगा, जिससे नवरात्र का उत्सव पूरे 10 दिनों तक धूमधाम से मनाया जाएगा।
11 अक्टूबर को कलश स्थापना, 20 को विसर्जन
ज्योतिषाचार्य डॉ. रतन कुमार मिश्रा के अनुसार, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि यानी 11 अक्टूबर, रविवार को शुभ मुहूर्त में घटस्थापना (कलश स्थापना) के साथ मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाएगी। वहीं 20 अक्टूबर, मंगलवार को नवमी हवन और दशमी के दिन मां भगवती की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा।
शारदीय नवरात्र 2026: 9 दिनों का संपूर्ण कैलेंडर
महाअष्टमी और नवमी का विशेष महत्व
नवरात्र में महाअष्टमी और महानवमी तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व है:
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कन्या पूजन की परंपरा: महाअष्टमी (18 अक्टूबर) और महानवमी (19 अक्टूबर) को घरों और पंडालों में 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर भोजन कराने और उपहार भेंट करने का विधान है।
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हवन व पूर्णाहुति: महानवमी के दिन विधि-विधान से हवन कर व्रत का पारण किया जाता है, जिससे साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
नवरात्र पूजन के 5 मुख्य नियम
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नियमित पाठ: नवरात्र के दौरान प्रतिदिन दुर्गा चालीसा अथवा ‘दुर्गा सप्तशती’ का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मां भगवती की असीम कृपा मिलती है।
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कन्या सेवा: पूरे 9 दिनों तक प्रतिदिन छोटी कन्याओं को फल या भोजन कराना अत्यंत मंगलकारी और पुण्य फलदायी माना गया है।
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अष्टमी पर कन्या भोज: महाअष्टमी के दिन नौ कन्याओं और एक बटुक (भैरव) का पूजन कर भोजन कराने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।
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संकल्पित साधना: यदि किसी विशेष मनोकामना के साथ संकल्प लेकर दुर्गा सप्तशती का संपूर्ण पाठ किया जाए, तो कुंडली के समस्त ग्रह दोष शांत होते हैं।
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सात्विक आचरण: व्रत रखने वाले साधकों को पूरे 9 दिन सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य और मन, वचन व कर्म की शुद्धि बनाए रखनी चाहिए।

