**नई दिल्ली:** आधुनिक भारत के इतिहास में डॉ. भीमराव अंबेडकर एक ऐसे प्रकाश स्तंभ के रूप में दर्ज हैं, जिनके विचारों ने न केवल तत्कालीन समाज की दिशा बदली बल्कि आज के प्रगतिशील भारत का खाका भी तैयार किया।

कल के भारत में बाबासाहेब का जीवन अपमान और गहरे सामाजिक भेदभाव के बीच बीता, जहाँ एक प्रतिभावान छात्र होने के बावजूद उन्हें बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना पड़ा। लेकिन उस दौर की उन कड़वी यादों और संघर्षों ने उनके भीतर समाज को बदलने का एक ऐसा संकल्प पैदा किया, जिसने सदियों पुरानी जड़ता को हिलाकर रख दिया। उन्होंने यह साबित किया कि शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे किसी भी प्रकार की बेड़ियाँ काटी जा सकती हैं।

विदेशी विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र और कानून में महारत हासिल करने के बाद जब वे भारत लौटे, तो उन्होंने केवल किताबों तक सीमित रहने के बजाय उसे धरातल पर उतारने का काम किया।

आज के संदर्भ में यदि हम देखें तो बाबासाहेब की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आज का भारतीय लोकतंत्र जिस ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की शक्ति पर खड़ा है, वह उन्हीं की दूरदर्शिता का परिणाम है। उनके द्वारा रचित संविधान ने देश के सबसे अंतिम व्यक्ति को भी वह राजनैतिक ताकत दी, जिसकी कल्पना कल के उस दौर में असंभव थी। आज देश में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, कार्यस्थलों पर सुरक्षित वातावरण और संपत्ति में उनके अधिकार, बाबासाहेब के उस ‘हिंदू कोड बिल’ के सपनों का ही विस्तार हैं, जिसके लिए उन्होंने मंत्री पद तक का त्याग कर दिया था। न केवल सामाजिक बल्कि आज के आर्थिक परिदृश्य में भी उनके विचार उतने ही प्रभावी हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना से लेकर दामोदर घाटी परियोजना जैसी नदी जल प्रबंधन योजनाओं तक में बाबासाहेब के आर्थिक शोध और विजन की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

वर्तमान समय में जब भारत एक वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, तब बाबासाहेब का ‘संवैधानिक नैतिकता’ का सिद्धांत हमारे लिए सबसे बड़ा मार्गदर्शक है। उनका मानना था कि केवल कानून बना देने से आजादी नहीं आती, बल्कि जब तक समाज में भाईचारा और समानता का भाव नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र अधूरा है। आज की युवा पीढ़ी उन्हें केवल एक कानूनी विशेषज्ञ के तौर पर नहीं बल्कि एक ऐसे वैश्विक नायक के रूप में देख रही है, जिसने ज्ञान और तर्क के दम पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव रखी। आज का सशक्त और आत्मनिर्भर भारत सही मायनों में बाबासाहेब के उन्हीं सपनों का प्रतिबिंब है, जहाँ जाति और धर्म से ऊपर उठकर हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्राप्त है। उनकी विरासत हमें निरंतर यह याद दिलाती है कि समाज का विकास तभी संभव है जब हम वंचितों और पिछड़ों को साथ लेकर मुख्यधारा में आगे बढ़ें।

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