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नई दिल्ली: भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने साल 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अपना पहला अनुमान जारी कर दिया है, जो कृषि और अर्थव्यवस्था के लिहाज से चिंताजनक नजर आ रहा है।
नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार, इस साल देश भर में मौसमी वर्षा ‘सामान्य से कम’ रहने की सबसे अधिक संभावना है। सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि जून से सितंबर के दौरान होने वाली कुल वर्षा लंबी अवधि के औसत (LPA) का 90 से 95 प्रतिशत के बीच रह सकती है।
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मौसम विभाग की रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार ‘न्यून वर्षा’ यानी सूखे जैसी स्थिति की संभावना 35 प्रतिशत है, जो कि सामान्य जलवायु संभावनाओं से कहीं अधिक है। इसके विपरीत, सामान्य वर्षा होने की उम्मीद केवल 27 प्रतिशत तक सिमट गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि देश के अधिकांश हिस्सों को इस बार कम बारिश का सामना करना पड़ सकता है।
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भौगोलिक दृष्टि से देखें तो वर्षा का वितरण काफी असमान रहने वाला है। पूर्वोत्तर भारत, उत्तर-पश्चिम के कुछ हिस्सों और दक्षिणी प्रायद्वीप के चुनिंदा इलाकों को छोड़कर, समूचे भारत में बादलों की आवाजाही कम रहेगी। मानसून के इस कमजोर रुख के पीछे प्रशांत महासागर में बदलती परिस्थितियां मुख्य कारण मानी जा रही हैं। वर्तमान में मौजूद ‘ला नीना’ की स्थिति धीरे-धीरे समाप्त हो रही है और मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि मानसून के चरम महीनों के दौरान ‘अल नीनो’ सक्रिय हो सकता है, जो अक्सर भारतीय मानसून को बाधित करने के लिए जाना जाता है।
हालांकि, हिंद महासागर से एक राहत भरी खबर मिल सकती है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मानसून के अंत तक हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) ‘सकारात्मक’ स्थिति में आ सकता है, जो बारिश की कमी को कुछ हद तक संतुलित करने में मदद कर सकता है। साथ ही, इस साल उत्तरी गोलार्ध और यूरेशिया में बर्फबारी का विस्तार भी सामान्य से कम रहा है, जिसका भारतीय मानसून के साथ सीधा संबंध होता है। फिलहाल, बदलते वैश्विक मौसम पैटर्न को देखते हुए आईएमडी ने अपनी निगरानी तेज कर दी है ताकि समय रहते सटीक जानकारी साझा की जा सके।


