रायपुर। जब-जब ‘अबूझमाड़’ का नाम आता है, तो ज़हन में घने जंगल और दुर्गम रास्तों की तस्वीरें तैरने लगती हैं। लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ का सबसे पहला और ऐतिहासिक लोक-पर्व ‘हरेली’ अबूझमाड़ के लिए एक नया सवेरा लेकर आया है।
छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार ने हरेली तिहार की पूर्व संध्या पर परंपरा को आधुनिकता और समृद्धि से जोड़ते हुए एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेला है। सदियों से पारंपरिक धान की खेती करने वाले अबूझमाड़ और धमतरी के किसानों के हाथों में इस बार 54 लाख 36 हजार रुपये का ‘चेक’ थमाया गया है—वह भी फसल काटने के बाद नहीं, बल्कि खेती शुरू करने से पहले (Advance)!
‘धान’ का मोह छोड़ ‘औषधि’ की ओर क्यों मुड़े किसान?
राजधानी रायपुर के ज़ीरो पॉइंट स्थित राज्य वन अनुसंधान भवन में जब वन मंत्री केदार कश्यप और औषधीय पादप बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने किसानों को अग्रिम प्रोत्साहन राशि बांटी, तो मंच से एक बेहद दिलचस्प बात सामने आई।
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कम पानी, शून्य कीटनाशक: धान की फसल में जहाँ बेहिसाब पानी और महँगी खाद लगती है, वहीं अश्वगंधा, शतावर, एलोवेरा, तुलसी और लेमनग्रास जैसी फसलें बेहद कम पानी और बिना कीटनाशक के भी लहलहा उठती हैं।
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खेत की ‘मेड़’ से भी लाखों की कमाई: किसानों को अपनी मुख्य फसल छोड़ने की भी ज़रूरत नहीं है! वे अपने खेतों के किनारों और मेड़ों (Borders) पर ये औषधीय पौधे लगाकर अतिरिक्त आय कमा रहे हैं।
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बाज़ार में ‘मांग’ और बेचने की नो-टेंशन: राज्य औषधीय पादप बोर्ड ने किसानों का सीधा Tie-up (अनुबंध) ‘मेसर्स स्टीविया’ और ‘इन्स्टा हर्ब्स’ जैसी बड़ी कंपनियों से कराया है। यानी पौधे बोर्ड मुफ़्त देगा और तैयार फसल को कंपनियाँ सीधे खेत से खरीद लेंगी।
अबूझमाड़ के 25 किसानों ने रचा इतिहास, महिला समूहों की भी बल्ले-बल्ले
इस विशेष योजना के तहत नारायणपुर (अबूझमाड़) के 25 जांबाज किसानों, धमतरी के 18 किसानों और 43 महिला स्व-सहायता समूहों को direct 54.36 लाख रुपये की राशि दी गई है। यह राशि इन दूरस्थ ग्रामीण इलाकों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है।
“यह सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं को नया जीवन देने की कोशिश है। छत्तीसगढ़ में जो 50 दुर्लभ औषधीय प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर थीं, उन्हें सहेजने के साथ-साथ अब हम अपने ग्रामीण भाइयों को वैश्विक बाज़ार (Global Market) का हिस्सा बना रहे हैं।”
— विकास मरकाम, अध्यक्ष (छत्तीसगढ़ राज्य औषधीय पादप बोर्ड)
हरेली का असली अर्थ ‘हरियाली से समृद्धि’
अब तक हरेली पर केवल कृषि औजारों (हल, नागर, कुदाल) की पूजा होती थी, लेकिन 2026 की यह हरेली अबूझमाड़ के किसानों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का गवाह बनी है। पारंपरिक खेती के साथ-साथ औषधीय पौधों का यह ‘ग्रीन गोल्ड’ आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के दूरस्थ अंचलों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदलने वाला है।


