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नई दिल्ली: महीना शाबान का है और फिजाओं में रहमतों का पहरा… इस्लामी कैलेंडर की वो मुकद्दस रात करीब आ रही है, जिसका अकीदतमंदों को बेसब्री से इंतजार रहता है। इस साल भारत में शब-ए-बरात 3 फरवरी 2026 को पूरी अकीदत और सादगी के साथ मनाई जाएगी। 15-शाबान 1447 हिजरी की यह तारीख सिर्फ एक रात नहीं, बल्कि इंसान और खुदा के बीच उस रूहानी रिश्ते की गवाह है, जहाँ सिसकियां और दुआएं तकदीर बदल देती हैं।

दुआओं के साये में कटेगी रात

2 फरवरी की सूरज ढलने वाली शाम से ही मस्जिदों और घरों में इबादत का वो नूरानी सिलसिला शुरू होगा, जो 3 फरवरी की भोर यानी फज्र की अजान तक जारी रहेगा। यह वह रात है जिसे ‘निजात’ (मुक्ति) की रात कहा जाता है। मान्यता है कि इस रात अल्लाह की रहमत आसमान-ए-दुनिया पर उतरती है और पुकारती है— “है कोई जो माफी मांगे और मैं उसे माफ कर दूँ? है कोई जो रिज्क मांगे और मैं उसे अता कर दूँ?”

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फैसलों की रात और अपनों की याद

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शब-ए-बरात को ‘फैसले की रात’ भी कहा जाता है। इसी रात आने वाले पूरे साल के लिए इंसानों की जिंदगी, मौत और रोजी-रोटी का हिसाब तय किया जाता है। अकीदतमंद इस रात न सिर्फ अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं, बल्कि कब्रिस्तानों की तरफ रुख कर उन अपनों के लिए भी दुआ-ए-मगफिरत करते हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। जलती शम्माओं और नम आंखों के बीच अपनों की याद में यह रात बेहद भावुक कर देने वाली होती है।

मिठास और तकसीम का दौर

परंपराओं के अनुसार, इस रात घरों में हलवे और लजीज पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें न केवल अपनों के साथ साझा किया जाता है, बल्कि गरीबों और जरूरतमंदों में भी बांटा जाता है। यह रात संदेश देती है कि अपनी खुशियों में उन्हें भी शामिल करें जिनके पास कम है।

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लैलतुल बारा’ (गुनाहों से बरी होने की रात)

अरबी भाषा में ‘लैल’ का अर्थ है रात और ‘बारा’ का अर्थ है बरी होना या छुटकारा पाना। आध्यात्मिक रूप से माना जाता है कि इस रात अल्लाह अपनी रहमत के दरवाजे खोल देता है। जो लोग सच्चे दिल से अपने पिछले गुनाहों पर शर्मिंदा होते हैं और भविष्य में नेक रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं, अल्लाह उन्हें नरक (जहन्नुम) की आग और अपने पापों के बोझ से ‘बरी’ (आजाद) कर देता है। इसीलिए इसे ‘मुक्ति की रात’ भी कहा जाता है।

रमजान की दस्तक

 शब-ए-बरात शाबान महीने के ठीक बीच (15 तारीख) में आती है। इसके ठीक 15 दिन बाद इस्लाम का सबसे पवित्र महीना ‘रमजान’ शुरू होता है। यह रात एक रिमाइंडर की तरह है कि अब अपने शरीर और रूह को पाक-साफ कर लें। लोग इस रात से ही इबादत की आदत डालना शुरू कर देते हैं ताकि वे रमजान के कठिन रोजों और लंबी तरावीह की नमाजों के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हो सकें। यह रमजान के स्वागत की पहली सीढ़ी है।

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 संजीदगी और अनुशासन 

पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि कई युवा इस पवित्र रात को सड़कों पर बाइक दौड़ाकर या शोर-शराबा करके गुजारते हैं, जो कि इस रात की पवित्रता के खिलाफ है। इस अपील का गहरा अर्थ यह है कि:  अल्लाह की याद सड़कों पर नहीं, बल्कि दिल की गहराइयों, घरों और मस्जिदों में होती है। इस्लाम सिखाता है कि आपकी वजह से किसी की नींद या सुकून में खलल न पड़े। इस रात को ‘सेलिब्रेशन’ (जश्न) की तरह नहीं, बल्कि ‘मेडिटेशन’ (आत्म-चिंतन) की तरह मनाया जाना चाहिए, ताकि खुदा से अपना रिश्ता मजबूत किया जा सके।

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