रायपुर: छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और संस्थागत प्रसव (अस्पतालों में सुरक्षित डिलीवरी) को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों के अब बड़े और सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। राज्य विधानसभा के पटल पर रखे गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में होने वाली मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) और शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में पिछले वर्षों की तुलना में न केवल बड़ी गिरावट आई है, बल्कि यह दर पिछले तीन सालों से एक स्थिर और सुरक्षित स्तर पर बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा ग्रामीण और सुदूर आदिवासी अंचलों में गर्भवती महिलाओं की सेहत और नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए चलाए जा रहे निरंतर अभियानों की बदौलत अब असमय होने वाली मौतों पर काफी हद तक लगाम कसने में कामयाबी मिली है।

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, प्रसव के दौरान होने वाली माताओं की मृत्यु दर यानी मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) के ग्राफ में एक बड़ा और सुखद बदलाव देखा गया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 में राज्य की मातृ मृत्यु दर 146 दर्ज की गई थी, जिसमें अगले ही साल भारी गिरावट आई। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के नए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में यह दर घटकर 124 पर आ गई। इसके बाद वर्ष 2025-26 और वर्तमान वित्तीय वर्ष 2026-27 में 15 जून 2026 तक की स्थिति में भी यह आंकड़ा लगातार 124 पर ही स्थिर बना हुआ है। प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर मापी जाने वाली इस दर में 22 अंकों की यह बड़ी गिरावट यह साबित करती है कि अब राज्य में प्रसव के दौरान माताओं की जिंदगी पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हाथों में है।

माताओं की सुरक्षा के साथ-साथ नवजात शिशुओं को जीवनदान देने के मामले में भी राज्य की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। प्रति एक हजार जीवित जन्मों पर आंकी जाने वाली शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023-24 में यह दर 37 थी। इसके बाद बेहतर स्वास्थ्य प्रबंधन और बच्चों के समय पर टीकाकरण की बदौलत वर्ष 2024-25 में यह घटकर 36 पर आ गई। तब से लेकर वर्ष 2025-26 और वर्तमान सत्र 2026-27 में जून के मध्य तक यह लगातार 36 पर ही रुकी हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि शिशु मृत्यु दर में गिरावट आना इस बात का सीधा प्रमाण है कि प्रसव के तुरंत बाद नवजात शिशुओं को मिलने वाली आवश्यक चिकित्सकीय देखभाल और पोषण के स्तर में जमीनी सुधार हुआ है।

इस महत्वपूर्ण कामयाबी के पीछे स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासनों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न मातृत्व सुरक्षा योजनाएं और मैदानी अमले की सक्रियता सबसे बड़ी वजह रही है। ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में काम करने वाली मितानिन बहनों और एएनएम द्वारा गर्भवती महिलाओं का समय पर पंजीयन करने, उन्हें नियमित जांच और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने तथा अस्पतालों में ही प्रसव कराने के प्रति लगातार जागरूक किया जा रहा है। इसके साथ ही, सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज, एम्बुलेंस की त्वरित सुविधा और शिशु सुरक्षा केंद्रों की स्थापना ने भी इस मोर्चे पर बड़ी भूमिका निभाई है। प्रशासन का कहना है कि इन आंकड़ों में आई स्थिरता एक सुखद संदेश है और आने वाले समय में इन दोनों मृत्यु दरों को शून्य के स्तर पर लाने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को और अधिक मजबूत किया जा रहा है।

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