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रायपुर: छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में अधिकारियों की भारी कमी के चलते प्रदेश की महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजनाओं की रफ्तार पर ब्रेक लगने की आशंका गहरा गई है। हाल ही में विधानसभा में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि विभाग के सबसे महत्वपूर्ण प्रथम और द्वितीय श्रेणी के कुल 172 पद रिक्त पड़े हैं। सबसे चौंकाने वाली स्थिति विभाग के शीर्ष प्रबंधन की है, जहाँ तकनीकी ढांचे का आधार माने जाने वाले प्रमुख अभियंता का एकमात्र स्वीकृत पद रिक्त है और मुख्य अभियंता के सभी आठ स्वीकृत पदों पर वर्तमान में कोई भी नियमित अधिकारी कार्यरत नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि विभाग का नेतृत्व स्तर पूरी तरह प्रभार के भरोसे चल रहा है।.

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इंजीनियरिंग विंग की स्थिति भी काफी चिंताजनक है क्योंकि नागरिक शाखा में सहायक अभियंता के सबसे ज्यादा 96 पद खाली हैं और कार्यपालन अभियंता के भी 19 पद रिक्त पड़े हैं।

अधीक्षण अभियंता स्तर पर भी तीन पद खाली चल रहे हैं, जबकि विद्युत और यांत्रिकी शाखा में सहायक और कार्यपालन अभियंताओं के कुल नौ पद रिक्त होने से मशीनी कार्यों में बाधा आ रही है। तकनीकी पदों के साथ-साथ जमीन से जुड़े मामलों को सुलझाने वाले भू-अर्जन अधिकारियों की स्थिति और भी खराब है क्योंकि विभाग में स्वीकृत सभी आठ पद वर्तमान में रिक्त हैं और नहर प्रतिसमाहर्ता के चार में से तीन पद खाली पड़े हैं।

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वैज्ञानिक शोध और जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी बड़ी रिक्तियां देखी गई हैं जहाँ भू-जल, रसायन और भौतिकी विंग में प्रथम और द्वितीय श्रेणी के लगभग 15 पद खाली हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि फील्ड और निर्णय लेने वाले पदों पर इतनी बड़ी संख्या में रिक्तियां सिंचाई परियोजनाओं की समय-सीमा और गुणवत्ता को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकती हैं, जिसका मुख्य कारण नई भर्तियों और पदोन्नति की प्रक्रिया में हो रही देरी को माना जा रहा है।

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विधानसभा के सत्र के दौरान पदोन्नति से जुड़े नियमों पर भी महत्वपूर्ण जानकारी साझा की गई। श्रीमती शेषराज हरवंश द्वारा पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार और विभागीय अनियमितताओं की जांच का सामना कर रहे अधिकारियों को पदोन्नति नहीं दी जाएगी।

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नियम के अनुसार, यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध जांच लंबित है, तो पदोन्नति के समय उनका नाम ‘विचारण क्षेत्र’ में तो रखा जाता है, लेकिन उनके चयन का परिणाम ‘सीलबंद लिफाफे’ में रखा जाता है। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती और अधिकारी दोषमुक्त नहीं हो जाता, उसे पदोन्नति प्रदान नहीं की जाती है। विभाग ने यह भी साफ किया कि चूंकि जांच के दौरान पदोन्नति दी ही नहीं जाती, इसलिए पूर्व में दी गई किसी पदोन्नति को निरस्त करने जैसा कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।

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