जैसे ही चिलचिलाती धूप अपनी दस्तक देती है, गाँवों की पगडंडियों और शहर के नुक्कड़ों पर एक ऐसा फल दिखने लगता है, जिसे देखते ही चेहरे पर मुस्कान और ज़ुबान पर तरावट आ जाती है। जिसे आज की नई पीढ़ी बड़े चाव से ‘मलबेरी’ पुकारती है, वह असल में हमारे देहात का वही अल्हड़ ‘तूत’ है,
जिसके पीछे कभी पूरा बचपन दौड़ता था। वह भी क्या दौर था, जब दोपहर की खामोशी में बच्चों की टोलियां चुपके से पेड़ों की टहनियों से जा चिपकती थीं। आज भले ही मोबाइल और गैजेट्स ने वो शोर छीन लिया हो, लेकिन लोकल हाट-बाजारों में इस देसी फल की आमद ने एक बार फिर उन सुनहरी यादों को ताज़ा कर दिया है।
शहतूत का सौंदर्य किसी कुदरती करिश्मे से कम नहीं है। यह फल प्रकृति के उन रंगों को समेटे हुए है जो किसी चित्रकार की तूलिका में भी मुश्किल से मिलते हैं। सुर्ख काले और गहरे लाल रंग की चमक जहाँ आँखों को सुकून देती है, वहीं सफेद, मटमैला और भूरा रंग अपनी सौम्य मिठास का अहसास कराता है। यह मुख्य रूप से दो आकारों में अपनी पहचान बनाता है—एक वह जो करीब डेढ़ इंच तक लंबा और सुडौल होता है, और दूसरा वह नन्हा सा गोल दाना जो महज एक सेंटीमीटर में अपनी पूरी रसीली दुनिया समेटे रहता है।
यह एक शुद्ध सीजनल और प्राकृतिक सौगात है, जो अब जंगलों की सीमा लांघकर हाइब्रिड के महंगे लिबास में शहरों के मॉल्स तक पहुँच गई है।
इस फल का सबसे जादुई मंजर तो तब दिखता है जब ये पूरी तरह पककर खुद-ब-खुद जमीन की गोद में गिरते हैं। पेड़ों के नीचे की वह ज़मीन किसी रंगीन कालीन जैसी नज़र आती थी और जब ये फल धूप में सूखते थे, तो पूरी ज़मीन ऐसी सुर्ख लाल दिखती थी मानो कुदरत ने वहाँ अपना सारा रंग बिखेर दिया हो। पुराने लोग आज भी उन गिरे हुए फलों को चुनकर खाने के मजे को याद कर भावुक हो जाते हैं।
आज हाइब्रिड के दौर में इसकी उपलब्धता भले ही सीमित हो गई हो और कीमतें भी चढ़ गई हों, लेकिन इसकी रूह आज भी वही देसी और बेमिसाल है।
सेहत के लिहाज़ से तो शहतूत किसी ‘सुपरफूड’ से कम नहीं है। यह कुदरत का वह तोहफा है जो न केवल पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है, बल्कि शरीर में खून की कमी को भी जादुई तरीके से पूरा करता है। विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट्स का भंडार होने के कारण यह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को नई ऊर्जा देता है और आँखों की रोशनी के लिए वरदान साबित होता है।
हाइब्रिड की चमक-धमक के बीच, आज भी जब बाज़ार के किसी कोने में वो देसी शहतूत अपनी खुशबू बिखेरता है, तो दिल बरबस ही कह उठता है—असली स्वाद तो आज भी इसी ‘तूत’ में छिपा है।
कुल मिलाकर, शहतूत या हमारा प्यारा ‘तूत’ सिर्फ एक मौसमी फल नहीं, बल्कि बदलते वक्त के बीच प्रकृति की एक अनमोल धरोहर है। गाँवों की उन रंगीन पगडंडियों से निकलकर शहरों के हाट-बाजारों तक का इसका सफर हमारी बदलती जीवनशैली की गवाही देता है। भले ही आज हाइब्रिड और महंगे दामों ने इसे थोड़ा ‘खास’ बना दिया हो, लेकिन इसकी असली पहचान आज भी उसी ज़मीनी स्वाद और सेहत के खजाने में छिपी है।
बचपन की वो सुर्ख लाल हथेलियाँ और पेड़ों के नीचे बिछा वह कुदरती कालीन शायद अब कम ही दिखे, पर जब भी बाज़ार में इसकी खुशबू महकती है, तो वह हमें याद दिलाती है कि असली सुख आज भी प्रकृति के इन छोटे-छोटे और रसीले उपहारों में ही बसा है। शहतूत की यह वापसी महज़ एक फल का आना नहीं, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का एक मीठा बहाना है।

