”अभी भी बरकरार है देसी रंगीन और रसीली शहतूत की धाक: जंगलों से निकलकर हाट-बाज़ारों तक का सफर”
जैसे ही चिलचिलाती धूप अपनी दस्तक देती है, गाँवों की पगडंडियों और शहर के नुक्कड़ों पर एक ऐसा फल दिखने लगता है, जिसे देखते ही चेहरे पर मुस्कान और ज़ुबान पर तरावट आ जाती है। जिसे आज की नई पीढ़ी बड़े चाव से ‘मलबेरी’ पुकारती है, वह असल में हमारे देहात का वही अल्हड़ … Continue reading ”अभी भी बरकरार है देसी रंगीन और रसीली शहतूत की धाक: जंगलों से निकलकर हाट-बाज़ारों तक का सफर”
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