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नई दिल्ली | 16 फरवरी, 2026

भारतीय अर्थव्यवस्था के थोक बाजार में जनवरी 2026 के दौरान महंगाई की रफ्तार में बढ़त दर्ज की गई है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित वार्षिक मुद्रास्फीति की दर जनवरी में 1.81 प्रतिशत रही, जो पिछले साल के इसी महीने की तुलना में अधिक है। गौर करने वाली बात यह है कि दिसंबर 2025 में यह दर महज 0.83 प्रतिशत थी, जिसका अर्थ है कि एक महीने के भीतर थोक कीमतों में तेजी आई है।

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महंगाई में आई इस ताजा बढ़त का सबसे बड़ा कारण विनिर्मित उत्पादों (Manufactured Products) और बुनियादी धातुओं की कीमतों में हुआ इजाफा है। विनिर्मित उत्पादों का सूचकांक, जिसकी थोक बाजार में 64 प्रतिशत से ज्यादा की हिस्सेदारी है, मासिक आधार पर 1.30 प्रतिशत बढ़ गया है। इस समूह में खासतौर पर बुनियादी धातुओं, खाद्य उत्पादों और कपड़ों के महंगे होने से औद्योगिक लागत पर असर पड़ा है।

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दूसरी ओर, आम आदमी की रसोई के मोर्चे पर मिली-जुली स्थिति देखने को मिली है। खाद्य सूचकांक में वार्षिक आधार पर 1.41 प्रतिशत की वृद्धि तो हुई है, लेकिन अगर मासिक स्तर पर देखें तो उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिली है। दिसंबर के मुकाबले जनवरी में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 0.92 प्रतिशत की गिरावट आई है। इस राहत के पीछे सबसे बड़ी वजह सब्जियों और आलू की कीमतों में आई भारी कमी है; जहाँ सब्जियों के दाम 14.62 प्रतिशत गिरे हैं, वहीं आलू की कीमतों में भी 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, प्याज और फलों की बढ़ती कीमतों ने इस राहत को थोड़ा कम जरूर किया है।

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ईंधन और बिजली के क्षेत्र से भी राहत भरी खबर है। इस समूह में मुद्रास्फीति की दर नकारात्मक (-4.01%) बनी हुई है, जिसका मतलब है कि पिछले साल की तुलना में ईंधन सस्ता हुआ है। जनवरी के महीने में बिजली और खनिज तेलों की कीमतों में कमी आने से इस समूह का सूचकांक 1.62 प्रतिशत नीचे गिरा है, जो परिवहन और विनिर्माण इकाइयों के लिए एक अच्छा संकेत है।

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कुल मिलाकर, जनवरी 2026 के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय बाजार एक संतुलित स्थिति की ओर बढ़ रहा है। जहाँ एक ओर विनिर्मित वस्तुओं की बढ़ती लागत ने महंगाई को ऊपर धकेला है, वहीं खाद्य वस्तुओं की मासिक गिरावट और ईंधन की कीमतों में कमी ने इसे बेकाबू होने से रोक लिया है। सरकार और नीति निर्माताओं की नजर अब इस बात पर रहेगी कि विनिर्मित उत्पादों की यह बढ़ती लागत आने वाले समय में खुदरा महंगाई (CPI) को कितना प्रभावित करती है।

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