नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने प्याज उत्पादक किसानों को उनकी फसल का बेहतर दाम दिलाने और बफर स्टॉक को मजबूत करने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने प्याज की सरकारी खरीद कीमत को 1875 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर अब 2125 रुपये प्रति क्विंटल (यानी 21.25 रुपये प्रति किलो) कर दिया है। यह नई बढ़ी हुई कीमत आज 4 जुलाई 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो गई है। हालांकि, इस फैसले के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि बार-बार कीमत बढ़ाने के बाद भी सरकारी खरीद की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है और क्या आने वाले महीनों में आम जनता के लिए प्याज महंगा होने वाला है।

लगातार पांचवीं बार बढ़ी कीमत, फिर भी सरकारी खरीद की रफ्तार सुस्त

सरकार हर साल कीमत स्थिरीकरण कोष के तहत प्याज का बफर स्टॉक तैयार करती है ताकि संकट के समय बाजार में प्याज उतारकर कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। इस साल शुरुआती सरकारी खरीद उम्मीद से काफी कम रही है, जिसे देखते हुए किसानों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने लगातार पांचवीं बार दरों में बढ़ोतरी की है।

इसके बावजूद 1 जून से अब तक केवल लगभग 2000 टन प्याज की ही सरकारी खरीद हो सकी है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं: कई इलाकों में किसानों को निजी व्यापारियों से तुरंत नकद भुगतान और सरकारी दरों से बेहतर दाम मिल रहे हैं।सरकारी केंद्रों पर खरीद के लिए प्याज की गुणवत्ता के तय पैमाने होते हैं, जिस पर हर किसान का प्याज खरा नहीं उतर पाता।देश के कई प्याज उत्पादक क्षेत्रों में सरकारी खरीद केंद्रों की संख्या पर्याप्त नहीं है, जिससे किसानों को दूर जाना पड़ता है।

क्या देश में प्याज की किल्लत है

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में फिलहाल प्याज की कोई कमी नहीं है और आपूर्ति पूरी तरह मजबूत है। इस साल देश में कुल प्याज उत्पादन 307.37 lakh टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल के 307.67 lakh टन के लगभग बराबर ही है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात के गोदामों में पर्याप्त मात्रा में प्याज का भंडारण है। हर दिन मंडियों में 50 हजार टन से ज्यादा प्याज पहुंच रहा है, जिसमें अकेले महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 30 हजार टन से अधिक है।

आपूर्ति सामान्य होने के बाद भी क्यों है दाम बढ़ने की आशंका

भले ही वर्तमान में आपूर्ति सामान्य है, लेकिन आने वाले महीनों में कुछ परिस्थितियां कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं:नासिक सहित देश के कई प्रमुख प्याज उत्पादक बेल्ट में खरीफ सीजन की बुवाई करीब 15 दिन देरी से शुरू हुई है। कुछ प्रमुख इलाकों में औसत से कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे नई फसल की पैदावार को लेकर अनिश्चितता है। भविष्य में किल्लत की आशंका को देखते हुए कुछ बड़े व्यापारियों ने अभी से भारी मात्रा में स्टॉक जमा करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज को अभी गोदामों में रोका जा रहा है ताकि कम आपूर्ति वाले महीनों में उसे ऊंचे दामों पर बेचा जा सके।

किसानों और आम उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर

इस फैसले से किसानों को सीधा फायदा यह होगा कि बाजार में प्याज की न्यूनतम कीमतों को एक सहारा मिलेगा और निजी व्यापारी भी प्रतिस्पर्धा के कारण किसानों को अच्छे दाम देने के लिए मजबूर होंगे।

वहीं दूसरी तरफ, वर्तमान में खुदरा बाजार में प्याज की औसत कीमत लगभग 31 रुपये प्रति किलो बनी हुई है। यदि आने वाले समय में मानसून अपनी रफ्तार पकड़ लेता है और खरीफ की नई फसल समय पर आ जाती है, तो कीमतों में कोई बड़ा उछाल नहीं आएगा। लेकिन अगर बारिश कमजोर रहती है और जमाखोरी बढ़ती है, तो आने वाले महीनों में आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ सकता है।

विदेशी बाजार और निर्यात का गणित

जून के महीने में भारत से करीब 1.50 लाख टन प्याज का निर्यात हुआ है, जो कि सामान्य है। हालांकि, आने वाले समय में वैश्विक बाजार जैसे खाड़ी देशों, श्रीलंका और सुदूर पूर्व में भारतीय प्याज को पाकिस्तान और चीन की सस्ती नई फसल से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल सकती है। यदि भारत का निर्यात घटता है, तो वह प्याज घरेलू बाजार में ही रहेगा, जिससे देश में आपूर्ति और बढ़ेगी तथा कीमतों पर दबाव कम होगा।

आगे की राह: सरकार की रहेगी पैनी नजर

आने वाले कुछ हफ्ते प्याज के बाजार के लिए बेहद संवेदनशील माने जा रहे हैं। बाजार के जानकारों के मुताबिक सरकार आने वाले दिनों में मानसून की चाल, खरीफ बुवाई के अंतिम आंकड़ों, मंडियों में आवक और सट्टेबाजी की गतिविधियों पर लगातार नजर रखेगी। यदि खुदरा बाजार में कीमतें अप्रत्याशित रूप से बढ़ती हैं, तो सरकार अपने बफर स्टॉक से अतिरिक्त प्याज बाजार में उतारकर आम उपभोक्ताओं को राहत दे सकती है।

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