शिमला:
त्योहारी सीजन के बीच आम उपभोक्ताओं की जेब पर सेब की महंगाई का असर दिख सकता है। देश के प्रमुख सेब उत्पादक राज्यों—हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर—में मौसम की मार और जलवायु परिवर्तन के कारण इस साल उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है। मंडियों में आवक कम होने से आने वाले दिनों में सेब के खुदरा दामों में तेजी आने के पूरे आसार हैं।
हिमाचल में आधा रह सकता है उत्पादन, मंडियों में आवक घटी
बागवानी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में पिछले साल करीब 7 लाख टन सेब का उत्पादन हुआ था, जबकि इस साल यह घटकर महज 3.5 से 3.75 लाख टन रहने का अनुमान है।
अब तक मंडियों में लगभग 3.87 लाख मीट्रिक टन सेब पहुंचा है, जबकि पिछले सीजन में इसी अवधि तक 4.07 लाख मीट्रिक टन पहुंच चुका था (करीब 20 हजार मीट्रिक टन की सीधी कमी)।मंडी मध्यस्थता योजना (MIS) के तहत पिछले सीजन में जहां इस अवधि तक 49 हजार मीट्रिक टन सेब खरीदा गया था, वहीं इस साल यह आंकड़ा घटकर लगभग 32 हजार मीट्रिक टन रह गया है।जम्मू-कश्मीर में भी प्रतिकूल मौसम की वजह से सेब उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट देखी जा रही है।
क्यों घटा उत्पादन? ‘चिलिंग ऑवर्स’ और बेमौसम मार
विशेषज्ञों के अनुसार, सेब की फसल पर जलवायु परिवर्तन का सीधा असर पड़ा है: सर्दियों के दौरान पर्याप्त बर्फबारी और बारिश न होने से सेब के पेड़ों को जरूरी ठंडक (चिलिंग आवर्स) नहीं मिल सकी। इसके बाद बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और तापमान में उतार-चढ़ाव से पौधों में फ्लावरिंग और फ्रूट सेटिंग की प्रक्रिया बाधित हुई। इस बार प्राकृतिक रूप से फलों का गिरना (ड्रॉपिंग) ज्यादा रहा और पूरा सेब सीजन लगभग 15 दिन की देरी से शुरू हुआ।
5,000 करोड़ की सेब आर्थिकी पर संकट, बाजार भाव पर पड़ेगा असर
हिमाचल प्रदेश बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. सतीश कुमार शर्मा के मुताबिक, सीजन अभी जारी है और अंतिम आंकड़ों में थोड़ा सुधार संभव है, लेकिन कुल आवक कम रहने से बाजार में आपूर्ति घटेगी, जिससे कीमतों में उछाल की संभावना बनी हुई है।हिमाचल प्रदेश में सेब उद्योग करीब ₹5,000 करोड़ का है। उत्पादन घटने का सीधा असर केवल बागवानों पर ही नहीं, बल्कि पैकेजिंग उद्योग, ढुलाई (ट्रांसपोर्टेशन), लेबर और स्थानीय मंडियों के कारोबार पर भी पड़ रहा है।
आधुनिक तकनीक और हाई डेंसिटी प्लांटेशन पर जोर
बदलते मौसम और जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए बागवानी विशेषज्ञ अब पारंपरिक बागवानी के बजाय आधुनिक ‘हाई डेंसिटी’ (सघन) पौधरोपण और नए उन्नत रूट स्टॉक अपनाने की सलाह दे रहे हैं, ताकि कम जमीन और विषम मौसम में भी बेहतर उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके।


