नई दिल्ली: देश की अदालतों में सालों से लंबित पड़े मामलों और सुनवाई पूरी होने के बाद भी फैसला सुनाने में होने वाली अत्यधिक देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। इस गंभीर समस्या से निपटने और न्याय प्रक्रिया को गति देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सभी उच्च न्यायालयों (High Courts) के लिए बेहद कड़े और अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्याय मिलने में देरी असल में न्याय न मिलने के बराबर है, इसलिए अब फैसलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखकर नहीं बैठा जा सकता।
शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि किसी मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद निर्धारित समयसीमा के भीतर फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो उस मामले को मौजूदा पीठ से वापस लेकर किसी अन्य पीठ (Bench) को सौंपा जा सकता है।
समयसीमा तय: 2 से 3 महीने के भीतर सुनाना होगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को किसी भी मामले में अंतिम बहस या सुनवाई पूरी होने के बाद अधिकतम दो से तीन महीने के भीतर अपना फैसला सुनाना होगा। कोर्ट ने माना कि महीनों या सालों तक फैसलों को सुरक्षित रखना याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का हनन है। यदि किसी अपरिहार्य कारण से निर्धारित अवधि में फैसला नहीं आता है, तो मुख्य न्यायाधीश के पास उस मामले को दूसरी बेंच को ट्रांसफर करने का पूरा अधिकार होगा, जहां सिरे से नए सिरे से सुनवाई की जाएगी।
फैसले में देरी पर देना होगा स्पष्टीकरण; कड़े कदम उठाने के संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि यदि किसी विशेष परिस्थिति या जटिल कानूनी पेचीदगियों के कारण तय समय में फैसला नहीं आ पा रहा है, तो संबंधित पीठ को इसका ठोस और लिखित कारण बताना होगा। वहीं, यदि बिना किसी उचित और तार्किक कारण के फैसले को लटकाया जाता है, तो इसे प्रशासनिक लापरवाही माना जाएगा।
न्यायालय का मानना है कि इस कदम से न केवल अदालतों पर बढ़ते मुकदमों का बोझ कम होगा, बल्कि आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत होगा। सभी राज्यों के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को इन निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने और इसकी नियमित निगरानी करने के लिए कहा गया है।

