रायपुर ;  छत्तीसगढ़ में मानसून की पहली फुहारों के साथ ही जहां एक ओर किसानों के चेहरे खिले हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य के ग्रामीण और सुदूर वनांचल इलाकों में एक बड़ा और जानलेवा मौसमी संकट गहरा गया है। शुरुआती बारिश के साथ ही उत्तर छत्तीसगढ़ (सरगुजा संभाग) के विभिन्न जिलों में सांप के काटने (सर्पदंश) से अब तक छह लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है।

यह स्थिति तब है जब केंद्र सरकार ने सर्पदंश को एक अधिसूचित बीमारी (Notified Disease) घोषित किया है और साल 2030 तक इससे होने वाली मौतों को आधा करने का राष्ट्रीय लक्ष्य रखा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी ग्रामीण सरकारी अस्पतालों में ‘एंटी-स्नेक वेनम’ (सांप के जहर की काट) की कमी नहीं है, बल्कि अंधविश्वास, जागरूकता का अभाव और अस्पताल पहुंचने में होने वाली देरी मरीजों की जान ले रही है।

क्षेत्रवार ग्राउंड रिपोर्ट: कहाँ, क्या हैं बड़ी चुनौतियाँ?

उत्तर छत्तीसगढ़ का यह हिस्सा अपनी विशेष भौगोलिक संरचना, ऊंचे पहाड़ों, गहरी घाटियों (पाठ क्षेत्रों) और घने साल-सागौन के जंगलों के लिए जाना जाता है। मानसून के आगमन के साथ ही यहाँ की जलवायु में अचानक नमी और तापमान में गिरावट आती है, जिससे प्राकृतिक आवासों (बिल और गुफाओं) में पानी भर जाने के कारण जहरीले सरीसृप (सांप) मजबूरन सूखे और सुरक्षित स्थानों की तलाश में इंसानी बस्तियों और मिट्टी के घरों का रुख करते हैं।

इस संभाग के अलग-अलग जिलों में भौगोलिक और जलवायु के आधार पर निम्नलिखित गंभीर चुनौतियाँ सामने आती हैं: छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला अपनी विशिष्ट भौगोलिक बनावट के कारण न केवल प्रदेश में, बल्कि देश-दुनिया में ‘नागलोक’ के नाम से कुख्यात और विख्यात है। यहाँ की जलवायु और मिट्टी सरीसृपों (Reptiles) के अनुकूल होने के कारण यह क्षेत्र सांपों की अत्यंत दुर्लभ और बेहद जहरीली प्रजातियों का प्राकृतिक गढ़ बन चुका है।मानसून के आते ही यहाँ का संकट अन्य जिलों की तुलना में कई गुना अधिक भयावह हो जाता है, जिसके पीछे यहाँ की अनूठी भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां हैं:

जलवायु और मिट्टी का अनूठा संयोग

जशपुर की जलवायु मानसूनी हवाओं के कारण जून से सितंबर के बीच अत्यधिक आर्द्र (नमी वाली) हो जाती है। यहाँ की ग्रेनाइट युक्त पथरीली ढलानें और लैटराइट (मुरूम) मिट्टी सांपों को छिपने के लिए प्राकृतिक खोह और बिल प्रदान करती हैं। जैसे ही पहली भारी मानसूनी बारिश होती है, इन पथरीली दरारों और बिलों में पानी भर जाता है। दम घुटने और अंडों को सुरक्षित रखने के लिए सांप (विशेषकर स्पेक्टेकल्ड कोबरा, मोनोकल्ड कोबरा और कॉमन करैत) बाहर निकलते हैं और सूखे व ऊंचे स्थानों की तलाश में सीधे ग्रामीणों के खपरैल व मिट्टी के घरों में घुस जाते हैं। यही कारण है कि बारिश के दिनों में यहाँ सांपों की सक्रियता अचानक दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ जाती है।

मौत के मुहाने पर बसे हॉटस्पॉट

जशपुर का ‘तपकरा’ क्षेत्र नागलोक का केंद्र बिंदु (Epicenter) माना जाता है। इसके साथ ही  संकरी पहाड़ियां और ईब नदी का कछार इलाका सांपों के प्रजनन के लिए सबसे मुफीद जगह है। तपकरा और आसपास के गांवों में ‘कॉमन करैत’ का घनत्व इतना अधिक है कि इसे भारत के सबसे खतरनाक सर्पदंश क्षेत्रों में गिना जाता है। यहाँ रात में जमीन पर सोने वाले ग्रामीण सबसे ज्यादा सर्पदंश का शिकार होते हैं।

जशपुर की सबसे बड़ी चुनौती इसकी दोहरी भौगोलिक संरचना है—ऊपरी हिस्सा ‘पाठ प्रदेश’ (पठारी इलाका) है और निचला हिस्सा मैदानी है। पंडरापाठ, सन्ना और बगीचा जैसे इलाके समुद्र तल से अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित विशाल पठार (Plateau) हैं। इन पाठ क्षेत्रों की भौगोलिक बुनावट बेहद जटिल है। यहाँ घने जंगलों के बीच छोटे-छोटे टोले-पारे (आश्रित ग्राम) बसे हैं। यदि पाठ क्षेत्र के किसी सुदूर गांव में किसी को सांप काट ले, तो उसे नीचे मैदानी इलाके में स्थित सर्वसुविधायुक्त अस्पतालों (जैसे जशपुर जिला अस्पताल या तपकरा एंटी-वेनम सेंटर) तक लाने के लिए मीलों लंबे घुमावदार पहाड़ी रास्तों और खतरनाक घाटियों को पार करना पड़ता है।

बारिश के दिनों में इन पाठ क्षेत्रों से बहने वाले पहाड़ी नाले और जलप्रपात उफान पर आ जाते हैं। कई अंदरूनी गांवों में पक्की सड़कें और पुल न होने के कारण ग्रामीण मरीज को ‘कांवड़’ या खाट पर लादकर पैदल ही उफनते नालों को पार कराने पर मजबूर होते हैं। घाटियों में भूस्खलन (Landslide) और भारी कोहरे के कारण एम्बुलेंस की रफ्तार थम जाती है। यही भौगोलिक लाचारी ‘गोल्डन आवर’ को पूरी तरह बर्बाद कर देती है और अस्पताल की दहलीज तक पहुँचने से पहले ही जहर मरीज के फेफड़ों और तंत्रिका तंत्र को पूरी तरह चोक कर देता है।

बलरामपुर (सामरी पाठ और सघन वन): छत्तीसगढ़ की सबसे ऊंची चोटी ‘गौरलाटा’ और सामरी पाठ इसी जिले में हैं। यहाँ के सुदूर वनांचल गांवों (जैसे रामचंद्रपुर या चशमी) में मानसूनी बारिश के कारण पहाड़ों से तेज पानी नीचे बहता है, जिससे सांप नीचे बसे गांवों के घरों में शरण लेते हैं।

  • सरगुजा (मैनपाट और उदयपुर के जंगल): ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ कहे जाने वाले मैनपाट और उदयपुर के घने जंगलों में मानसूनी कोहरे और लगातार होने वाली रिमझिम बारिश के कारण दृश्यता (Visibility) कम हो जाती है। झाड़ियों और रास्तों में सांप दिखाई नहीं देते, जिससे मवेशियों को चराने गए ग्रामीणों या खेतों में काम कर रहे किसानों के सर्पदंश का शिकार होने की आशंका सबसे अधिक होती है।

  • सूरजपुर और कोरिया (तमोर पिंगला व गुरु घासीदास नेशनल पार्क का बफर जोन): इन जिलों का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के बफर जोन से घिरा हुआ है। मानसूनी जलवायु में यहाँ की नदियां (जैसे रेहंड और गोपद) और पहाड़ी नाले अचानक उफान पर आ जाते हैं, जिससे दर्जनों वनांचल गांव टापू में तब्दील हो जाते हैं।

‘करैत’ का धोखा और वेंटिलेटर की जरूरत

बिलासपुर और कोरबा सर्कल के जंगलों में सक्रिय पर्यावरण संस्था ‘नोवा नेचर वेलफेयर सोसाइटी’ और वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र में ‘करैत’ (Krait) सांपों का खतरा सबसे ज्यादा देखा गया है। करैत सांप रात के वक्त सूखे और गर्मी की तलाश में इंसानी बिस्तरों तक पहुंच जाता है। जब यह सोते हुए इंसान को डसता है, तो इसके बारीक दांतों के कारण केवल एक मामूली सुई चुभने जैसा अहसास होता है और पीड़ित दोबारा सो जाता है। इसका न्यूरोटॉक्सिक (तंत्रीका तंत्र को प्रभावित करने वाला) जहर धीरे-धीरे श्वसन तंत्र की मांसपेशियों को पैरालिसिस (लकवाग्रस्त) कर देता है, जिससे मरीज की नींद में ही दम घुटने से मौत हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार लोग इसे सामान्य मौत समझ लेते हैं, जबकि समय पर अस्पताल पहुंचकर वेंटिलेटर सपोर्ट मिलने से मरीज को आसानी से बचाया जा सकता है।

 आधुनिक इलाज पर भारी अंधविश्वास

दक्षिण छत्तीसगढ़ के अंदरूनी और आदिवासी अंचलों में आज भी सांप काटने पर पहला भरोसा डॉक्टर के बजाय स्थानीय बैगा-गुनिया (पारंपरिक ओझा) पर किया जाता है।झाड़-फूंक के चक्कर में घंटों बर्बाद कर दिए जाते हैं। घाव को मुंह से चूसना, ब्लेड से चीरा लगाना, गर्म लोहे या चीजों से दागना और पैर-हाथ को रस्सी से इतनी कसकर बांध देना कि वहां खून का दौरा ही बंद हो जाए—ये पुरानी पद्धतियां जहर को रोकने के बजाय इन्फेक्शन, गैंग्रीन (अंग का सड़ना) और अन्य गंभीर जटिलताओं को बढ़ा देती हैं।

₹4 लाख के मुआवजे की जानकारी से महरूम हैं आदिवासी

छत्तीसगढ़ शासन के नियमों के मुताबिक, सांप काटने से होने वाली मौत को ‘प्राकृतिक आपदा’ के दायरे में रखा गया है। इसके तहत पीड़ित परिवार को राजस्व विभाग (Revenue Department) की ओर से 4 लाख रुपये की आर्थिक सहायता (मुआवजा) देने का प्रावधान है। लेकिन विडंबना यह है कि सुदूर वनांचल और अबूझमाड़ जैसे क्षेत्रों में जागरूकता की भारी कमी है। लोग न तो अस्पताल में पोस्टमार्टम (PM) करवाते हैं और न ही कागजी प्रक्रिया से वाकिफ हैं। इसके चलते हर साल दर्जनों मौतें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हो पातीं और गरीब आदिवासी परिवार इस बड़ी आर्थिक मदद के आवेदन से वंचित रह जाते हैं।

डॉक्टरों की चेतावनी: 80% सांपों में जहर ही नहीं होता

डॉ. योगेंद्र मल्होत्रा (मेडिसिन प्रोफेसर, पं. जेएनएम मेडिकल कॉलेज, रायपुर): “जंगलों या गांवों में पाए जाने वाले लगभग 80% सांप जहरीले नहीं होते हैं। लोग अक्सर डर और घबराहट (हार्ट अटैक) के कारण दम तोड़ देते हैं। बाकी 20% जहरीले सांपों (जैसे कोबरा या करैत) के काटने पर भी अगर मरीज को तुरंत एंटी-स्नेक वेनम का इंजेक्शन मिल जाए, तो उसकी जान 100% बचाई जा सकती है। झाड़-फूंक और टोटकों में समय गंवाना मौत को आमंत्रण देने जैसा है।”

सर्पदंश होने पर क्या करें और क्या न करें?

  • क्या करें: मरीज को तुरंत शांत करें और सीधा लिटाएं। प्रभावित हिस्से (हाथ या पैर) को बिल्कुल न हिलाएं ताकि जहर शरीर में तेजी से न फैले। घड़ी, अंगूठी या कसे कपड़े तुरंत उतार दें और सीधे नजदीकी सरकारी अस्पताल ले जाएं।

  • क्या न करें: झाड़-फूंक के चक्कर में न पड़ें। घाव पर चीरा न लगाएं, उसे चूसने की कोशिश न करें और न ही कोई घरेलू जड़ी-बूटी लगाएं।

‘गोल्डन आवर’ की बर्बादी और भौगोलिक बाधाएं:

इन सभी पांचों जिलों में हाल ही में हुई 6 मौतों के गहन विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि आधुनिक चिकित्सा (एंटी-स्नेक वेनम) उपलब्ध होने के बाद भी केवल ‘गोल्डन आवर’ (सर्पदंश के बाद का पहला अत्यंत महत्वपूर्ण एक घंटा) बर्बाद होने के कारण मरीजों की जान नहीं बचाई जा सकी। इसके पीछे पूरी तरह से यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ जिम्मेदार हैं:

  1. संपर्क मार्गों का अभाव: सुदूर पहाड़ों और वनों के भीतर बसे आश्रित गांवों (टोला-पारा) से मुख्य पक्की सड़क तक पहुंचने के लिए आज भी पगडंडियों का सहारा लेना पड़ता है। बारिश के दिनों में ये रास्ते दलदल और कीचड़ में बदल जाते हैं, जिससे एम्बुलेंस या दुपहिया वाहन का अंदर पहुंचना नामुमकिन हो जाता है।

  2. उफनते नदी-नाले और टापू बने गांव: मानसून में पहाड़ी नदी-नाले (जंगली नाले) अचानक कुछ ही घंटों की बारिश में उफान पर आ जाते हैं। इन नालों पर पुल-पुलिया न होने के कारण ग्रामीण मरीज को खाट पर सुलाकर या पैदल नाला पार कराने का जोखिम उठाते हैं। इस प्रक्रिया में 3 से 4 घंटे की देरी हो जाती है, जिससे जहर पूरे शरीर (तंत्रीका तंत्र और रक्त संचार) में फैल जाता है और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) पहुँचने से पहले ही मरीज दम तोड़ देता है।

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