संवाददाता:** छत्तीसगढ़ में निजी यात्री बसों के टिकट बुकिंग एजेंट पूरी तरह से ‘अघोषित’ और ‘अनियंत्रित’ तरीके से काम कर रहे हैं। राजधानी रायपुर से लेकर बस्तर और सरगुजा तक, राज्य के किसी भी जिले में इन एजेंटों को विनियमित करने के लिए परिवहन विभाग के पास न तो कोई स्पष्ट नीति है और न ही जिलेवार कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है। इस प्रशासनिक उदासीनता का सीधा असर प्रदेश के लाखों यात्रियों की सुरक्षा पर पड़ रहा है।

अस्त-व्यस्त परिवहन व्यवस्था: हर जिले की एक ही कहानी
राज्य के प्रमुख बस स्टैंडों (जैसे रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा, रायगढ़ और जशपुर) का निरीक्षण करने पर एक समान तस्वीर उभरती है। बस संचालकों द्वारा नियुक्त ये एजेंट किसी भी आधिकारिक पंजीकरण या पुलिस सत्यापन के दायरे में नहीं आते। परिवहन विभाग के अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि वर्तमान मोटर व्हीकल एक्ट या राज्य के स्थानीय परिवहन नियमों में इन एजेंटों को लाइसेंस जारी करने का कोई प्रावधान ही नहीं है। विभाग इन्हें केवल ‘बस संचालकों के निजी कर्मचारी’ मानता है, जिससे इनकी जवाबदेही शून्य हो जाती है।

प्रतिस्पर्धा और अराजकता: यात्रियों के लिए बड़ा खतरा
प्रदेश के हर बस स्टैंड पर एजेंटों के बीच कमीशन को लेकर होने वाली प्रतिस्पर्धा ने अराजकता को जन्म दिया है। अधिक से अधिक यात्रियों को अपनी बसों में खींचने की होड़ में एजेंट अक्सर आपस में मारपीट और विवाद करते हैं। इसका खामियाजा यात्रियों को भुगतना पड़ता है। कई बार ये बसें शहर के व्यस्त बाजारों और मुख्य चौराहों पर अनधिकृत रूप से रुकती हैं, जिससे यातायात जाम की समस्या प्रदेश भर के शहरों की एक स्थायी परेशानी बन गई है।

सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
एजेंटों के पृष्ठभूमि की जांच न होने के कारण सुरक्षा का संकट सबसे बड़ा है। बीते समय में प्रदेश के विभिन्न जिलों से लूट, दुर्व्यवहार और विवाद के दौरान हिंसक घटनाओं की खबरें आती रही हैं। हालांकि, परिवहन विभाग इसे बस मालिकों का आंतरिक मामला बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। प्रदेश का कोई भी जिला प्रशासन अब तक इन एजेंटों के लिए ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ या ‘अनिवार्य पंजीकरण’ जैसी कोई व्यवस्था लागू नहीं कर पाया है।

क्या कहते हैं नियम?
परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासन चाहे, तो जिला कलेक्टर के माध्यम से स्थानीय स्तर पर बस स्टैंड संचालन नियमावली में संशोधन कर एजेंटों के लिए आईडी कार्ड और पुलिस सत्यापन अनिवार्य किया जा सकता है। लेकिन फिलहाल, परिवहन विभाग की सुस्ती के चलते पूरा सिस्टम ‘बस संचालकों की मर्जी’ पर चल रहा है।

जिला परिवहन अधिकारी, अरविंद भगत के अनुसार, बुकिंग एजेंट बस संचालकों के निजी कर्मचारी हैं। वर्तमान में इन्हें लाइसेंस जारी करने या इनके रिकॉर्ड रखने का परिवहन विभाग के पास कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।

राज्य में बढ़ते बस हादसों और स्टैंडों पर फैलती अव्यवस्था के बीच, यह सवाल अब और अधिक प्रासंगिक हो गया है कि क्या सरकार इन ‘अदृश्य एजेंटों’ को कानून के दायरे में लाएगी, या फिर यात्रियों की सुरक्षा इसी तरह राम भरोसे बनी रहेगी?

 

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