छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि यदि परिवार का कोई एक सदस्य पहले से सरकारी सेवा में है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अनुकंपा नियुक्ति का दावा अपने आप खत्म हो जाता है। अदालत ने कहा कि सिर्फ तकनीकी नियमों की आड़ लेकर किसी जरूरतमंद के आवेदन को खारिज करना गलत है। अधिकारियों को नियमों की व्याख्या करने के बजाय परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति और मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए।
यह मामला अंबिकापुर नगर निगम का है, जहां याचिकाकर्ता के पिता सफाई कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे। सेवाकाल के दौरान अचानक उनका निधन हो गया। उनके बड़े परिवार में पत्नी, तीन बेटे और एक बेटी शामिल थे, जो पूरी तरह से उन्हीं की आय पर निर्भर थे। पिता की मृत्यु के बाद उनके बेटे ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन नगर निगम ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता की मां पहले से ही सफाई कर्मचारी के रूप में काम कर रही हैं। निगम ने दलील दी कि साल 2013 की नीति के मुताबिक, यदि परिवार का कोई भी सदस्य पहले से सरकारी नौकरी में है, तो अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसकी मां की तनख्वाह बेहद कम है और इतने बड़े परिवार का खर्च उससे नहीं चल सकता।
इस मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डबल बेंच ने अंबिकापुर नगर निगम द्वारा दायर की गई अपील को सिरे से खारिज कर दिया और सिंगल बेंच के उस पुराने आदेश को सही ठहराया, जिसमें याचिकाकर्ता को नौकरी देने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि सरकार की अनुकंपा नियुक्ति योजना का मुख्य उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को अचानक आए भारी आर्थिक संकट से उबारना है। अधिकारियों को इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही जमीनी हकीकत के आधार पर फैसला लेना चाहिए।
हाईकोर्ट ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि अधिकारियों ने यह जानने का प्रयास बिल्कुल नहीं किया कि मुख्य कमाने वाले की मौत के बाद परिवार किस तरह की परेशानियों से गुजर रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी परिवार के एक सदस्य का बेहद कम तनख्वाह वाले पद पर होना यह साबित नहीं करता कि परिवार आर्थिक संकट या गरीबी से बाहर आ चुका है। अनुकंपा नियुक्ति भले ही कोई मूल अधिकार न हो, लेकिन यह सरकार की एक कल्याणकारी व्यवस्था है। इसलिए हर मामले की जमीनी स्तर पर अलग-अलग जांच होनी चाहिए, ताकि केवल तकनीकी नियमों की वजह से कोई जरूरतमंद परिवार इस राहत से वंचित न रह जाए। इस फैसले से याचिकाकर्ता के परिवार को बड़ी राहत मिली है।

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