नई दिल्ली:
लिव-इन रिलेशनशिप और ब्रेकअप से जुड़े एक बेहद अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कानूनी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति आपसी रिश्ते में शादी से इनकार कर देता है और इसके बाद दूसरा पक्ष आत्महत्या कर लेता है, तो इसे अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत ‘आत्महत्या के लिए उकसाना’ (Abetment to Suicide) नहीं माना जा सकता।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस टिप्पणी के साथ मुख्य आरोपी, उसके माता-पिता, बहन और दोस्तों सहित कुल छह लोगों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया। पीठ ने कहा कि मानसिक तनाव या ब्रेकअप पर हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है, लेकिन इसके लिए शादी से मना करने वाले को सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
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मामले की पृष्ठभूमि: आपसी सहमति के रिश्ते से खुदकुशी तक
तेलंगाना से जुड़े इस मामले में मृतका और मुख्य आरोपी आपसी सहमति से करीब तीन महीने तक एक ही घर में लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे। खास बात यह थी कि दोनों के इस रिश्ते की पूरी जानकारी उनके परिवारों को थी और उन्होंने इसे स्वीकार भी कर लिया था। हालांकि, कुछ समय साथ रहने के बाद युवक ने महिला से शादी करने से साफ इनकार कर दिया।
शादी से हुए इस इनकार से आहत होकर महिला ने आत्मघाती कदम उठाते हुए आत्महत्या कर ली। घटना के बाद मृतका की बहन की शिकायत पर पुलिस ने मुख्य आरोपी के साथ-साथ उसके माता-पिता, बहन, दोस्त और बहन के होने वाले दूल्हे सहित कुल छह लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया था।
मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शादी से इनकार करना अपने आप में खुदकुशी के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। अदालत ने सभी छह आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और मुकदमे को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
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शादी से इनकार का मकसद आत्महत्या कराना नहीं था:
पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी का शादी से इनकार करने का मकसद महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करना कतई नहीं था। न ही आरोपियों पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि उन्हें पहले से इस बात का अंदेशा था कि शादी न करने के फैसले का नतीजा महिला की जान जाने के रूप में निकलेगा।
मानसिक प्रतिक्रियाएं अलग-अलग होती हैं:
अदालत ने मानवीय मनोविज्ञान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जीवन की परिस्थितियों और रिश्तों के टूटने (ब्रेकअप) पर हर व्यक्ति अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देता है। कोई इससे उबर जाता है तो कोई आत्मघाती कदम उठा लेता है। किसी के अति-संवेदनशील होने या अप्रत्याशित कदम उठाने का दोष दूसरे पक्ष पर ‘उकसाने’ के रूप में नहीं मढ़ा जा सकता।
उकसावे (Abetment) का कोई सीधा सबूत नहीं मिला:
अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि ऐसा कोई भी दस्तावेजी या मौखिक साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपियों ने किसी सक्रिय कृत्य (Active Act) या साजिश के जरिए मृतका को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया था।
शिकायतकर्ता के सभी दावे सच मान लें, तब भी नहीं बनता अपराध
अदालत ने कहा, “यदि हम शिकायतकर्ता की पूरी बात पर यकीन भी कर लें, तो भी यह मामला सिर्फ शादी से इनकार करने का है, जिसके कारण आहत होकर महिला ने जान दे दी। न तो आरोपियों का कोई आपराधिक इरादा (Mens Rea) था और न ही उनका कोई आचरण उकसावे के दायरे में आता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि केवल आरोपों के आधार पर छह लोगों को लंबे समय तक आपराधिक मुकदमे की प्रताड़ना में नहीं रखा जा सकता। यह फैसला उन मामलों के लिए एक नजीर बनेगा जहां रिश्तों में अनबन या शादी टूटने के बाद आत्महत्या के मामलों में पूरे परिवार पर आपराधिक धाराएं लगा दी जाती हैं।