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नई दिल्ली:
सरकारी सेवा में 32 साल का जीवन खपा देने वाले एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (चपरासी) को रिटायरमेंट के बाद पेंशन और अन्य देयकों के लिए एक दशक (10 साल) तक दफ्तरों के चक्कर काटने को सुप्रीम कोर्ट ने ‘गंभीर अन्याय’ करार दिया है। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के रवैये पर सख्त नाराजगी जताते हुए दो टूक कहा कि “पेंशन कोई दया, चैरिटी या इनाम नहीं है, बल्कि कर्मचारी द्वारा दी गई सेवा के बदले मिलने वाला उसका स्थगित भुगतान (Deferred Payment) और कानूनी अधिकार है।”
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को तलब करते हुए 31 दिसंबर 2026 तक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ पूछा है कि इस 10 साल की अमानवीय देरी के लिए कौन-कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं और पीड़ित कर्मचारी को मुआवजा देने को लेकर सरकार का क्या रुख है।
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मामले की पूरी टाइमलाइन: 32 साल की सेवा से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक
| वर्ष / तारीख | घटनाक्रम |
| वर्ष 1984 | जगदीश प्रसाद त्रिपाठी की बतौर चपरासी सरकारी सेवा में नियमित नियुक्ति हुई। |
| 31 जुलाई 2016 | 32 साल की निरंतर और पेंशन योग्य सेवा के बाद वे पद से सेवानिवृत्त हुए। |
| वर्ष 2018 | विभाग द्वारा पेंशन रोके जाने पर उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। |
| अप्रैल 2026 | हाईकोर्ट से त्वरित राहत न मिलने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। |
| वर्ष 2026 | भारी फजीहत के बाद सरकार ने ₹7.16 लाख जीपीएफ और ₹29.06 लाख एरियर का भुगतान किया। |
| 4 जनवरी 2027 | सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली निर्णायक सुनवाई तय की गई है। |
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यूपी सरकार की दलील खारिज: अनुपस्थिति का बहाना, पर रिकॉर्ड में मिला वेतन
उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने हलफनामे में यह सफाई देने की कोशिश की कि कर्मचारी 20 जुलाई 2009 से 30 नवंबर 2010 के बीच अनुपस्थित रहा था, जिसके चलते केवल प्रोविजनल पेंशन स्वीकृत की गई थी।
हालांकि, अदालत के रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि उक्त कथित अनुपस्थिति अवधि के दौरान भी कर्मचारी को बकायदा वेतन का भुगतान किया गया था। पीठ ने सरकार की इस तकनीकी दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि एक छोटे स्तर के कर्मचारी को उसकी बिना किसी गलती के 10 साल तक पाई-पाई के लिए तरसाना तंत्र की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
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‘देरी से मिला भुगतान कोई अहसान नहीं’, SC ने तय की जवाबदेही
सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि कर्मचारी को हाल ही में 7,16,295 रुपये जीपीएफ और 29,06,663 रुपये पेंशन एरियर व अन्य लाभों के रूप में दे दिए गए हैं।
इस पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि 10 साल बाद बकाया चुका देना अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। पीठ ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से निम्नलिखित बिंदुओं पर जवाब मांगा है:10 साल तक फाइलें दबाकर रखने वाले अधिकारियों के नाम सामने लाए जाएं और उनके खिलाफ प्रस्तावित अनुशासनात्मक कार्रवाई का ब्योरा दिया जाए। एक दशक तक मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलने वाले बुजुर्ग कर्मचारी को दिए जाने वाले मुआवजे का प्रस्ताव सौंपा जाए। प्रदेश में ऐसी फुल-प्रूफ पेंशन व्यवस्था तैयार की जाए, जिससे किसी भी सेवानिवृत्त कर्मचारी के पेंशन भुगतान में एक दिन की भी अनावश्यक देरी न हो।
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सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख केवल एक रिटायर्ड चपरासी के बकाये तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश भर के उन लाखों सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा है जो रिटायरमेंट के बाद लालफीताशाही का शिकार बनते हैं। मामले की अगली सुनवाई 4 जनवरी 2027 को होगी, जहां मुख्य सचिव की रिपोर्ट पर विचार किया जाएगा।


