बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मामले में अपना स्पष्ट रुख रखते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक लिव-इन संबंध में रहने वाले वयस्कों के बीच बने शारीरिक संबंध सहमति से माने जाएंगे। न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी साफ किया है कि यदि पुरुष द्वारा बाद में शादी से इनकार कर दिया जाता है, तो उसे कानूनी रूप से बलात्कार नहीं माना जा सकता है। न्यायमूर्ति संजय एस अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए महिला की अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
यह मामला भिलाई नगर निगम में परियोजना प्रबंधक के पद पर कार्यरत 40 वर्षीय महिला से जुड़ा है, जिसने एक पुरुष के खिलाफ बलात्कार और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोप लगाए थे। महिला के अनुसार, 2019 में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात आरोपी से हुई थी और शादी का आश्वासन मिलने के बाद वे शारीरिक संबंधों में आए थे। महिला का आरोप था कि दो साल तक साथ रहने के बाद जब पढ़ाई पूरी हुई, तो आरोपी ने शादी करने से इनकार कर दिया और उसके साथ जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाए। इसके बाद दिसंबर 2022 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी, लेकिन निचली अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को बरी कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता से सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने पाया कि महिला ने खुद अपनी जिरह के दौरान यह स्वीकार किया था कि वह महिला आयोग के समक्ष 30 लाख रुपये में विवाद को निपटाने के लिए तैयार थी और आरोपी ने समझौते के तहत उसे 15 लाख रुपये का चेक भी दिया था। इसके अलावा, अदालत ने महिला का परीक्षण करने वाले डॉक्टर की गवाही पर भी विशेष भरोसा जताया, जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि मेडिकल जांच के दौरान महिला ने न तो जबरदस्ती की कोई शिकायत की थी और न ही उसके शरीर पर ऐसी कोई चोट मिली थी जो अप्राकृतिक यौन संबंध की पुष्टि करती हो।
पीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि बदलते दौर में जैसे-जैसे महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं, अदालतों को ऐसे मामलों की जांच करते समय किसी संकीर्ण दृष्टिकोण को नहीं अपनाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े शादी की इच्छा जरूर व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन यह अकेला तथ्य यह साबित नहीं करता कि शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे पर ही आधारित थे। यदि जोड़े लंबे समय तक साथ रहे हैं, तो यह अनुमान लगाया जाएगा कि उन्होंने स्वेच्छा से एक-दूसरे का साथ चुना था और वे अपने संबंधों के परिणामों से भली-भांति अवगत थे।
अदालत ने अंत में यह निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने सभी साक्ष्यों का सही विश्लेषण किया था और अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ बलात्कार के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह से विफल रहा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप अपना निर्णय देते हुए उच्च न्यायालय ने आरोपी की रिहाई के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है और महिला की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया है।


