नई दिल्ली | 06 फरवरी 2026
केंद्र सरकार ने बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए स्पष्ट किया है कि ‘सहमति की आयु’ (Age of Consent) को 18 वर्ष से कम करने का कोई विचार नहीं है। लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी ने बताया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए पोक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 का उद्देश्य नाबालिगों को हर प्रकार के शोषण, छल और दबाव से बचाना है।
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18 वर्ष की आयु ही क्यों है मानक?
सरकार ने तर्क दिया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS), बाल विवाह निषेध अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम सहित सभी प्रमुख कानूनों में वयस्कता की आयु 18 वर्ष निर्धारित है। विधिक ढांचे में इस एकरूपता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नाबालिगों के साथ किसी भी प्रकार का यौन कृत्य अपराध की श्रेणी में ही रहे। कानून यह मानता है कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे ऐसे निर्णयों के दूरगामी परिणामों को समझने में विधिक और मनोवैज्ञानिक रूप से सक्षम नहीं होते हैं।
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सहमति का तर्क अमान्य
मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि पोक्सो अधिनियम के तहत अठारह वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के साथ कोई भी यौन कृत्य अपराध माना जाएगा, चाहे इसके लिए कथित तौर पर सहमति दी गई हो या नहीं। उन्होंने चेतावनी दी कि सहमति की आयु में किसी भी प्रकार की शिथिलता या छूट बच्चों, विशेषकर किशोरियों की सुरक्षा को कमजोर करेगी और उनके शोषण के जोखिम को बढ़ा देगी।
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कठोर दंड और अंतर्राष्ट्रीय मानक
अपराधियों में डर पैदा करने के लिए वर्ष 2019 में कानून में संशोधन कर गंभीर यौन अपराधों के लिए मृत्युदंड को भी शामिल किया गया है।भारत में ‘बालक’ की परिभाषा संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) के अनुरूप है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के अधिकारों की रक्षा करती है। पोक्सो नियम, 2020 के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि पीड़ित बच्चों को जांच और सुनवाई के दौरान सुरक्षा और संस्थागत सहयोग मिले।
सरकार का यह रुख साफ करता है कि बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के मामले में किसी भी प्रकार के ‘सहमति’ के तर्क को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार का प्राथमिक उद्देश्य बच्चों के लिए एक ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाना है जहाँ उन्हें किसी भी प्रकार की हिंसा या दुराचार से बचाया जा सके।
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