जशपुरनगर:
रियासत कालीन वैभव, जनजातीय संस्कृति और सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल पेश करने वाला जशपुर का ऐतिहासिक दशहरा महापर्व इस वर्ष 2026 में भी पूरे पारंपरिक विधि-विधान और हर्षोल्लास के साथ आयोजित किया जाएगा। करीब 800 से 1000 वर्षों से चली आ रही इस गौरवशाली परंपरा का निर्वहन जशपुर राजपरिवार 27 पीढ़ियों से निरंतर करता आ रहा है। पूर्व सांसद रणविजय सिंह जूदेव, यश प्रताप सिंह जूदेव, विजय आदित्य सिंह जूदेव और शौर्य प्रताप सिंह जूदेव सहित राजपरिवार के सदस्यों के सान्निध्य में समाज के सभी वर्ग मिलकर इस महापर्व को संपन्न कराएंगे।
1000 साल पुराना इतिहास: राजा सुजान राय के समय से परंपरा
राजपरिवार के अनुसार, प्राचीन समय में यहां डोम राजाओं का शासन था। उनके पूर्वज राजा सुजान राय ने उन्हें पराजित कर करीब हजार वर्ष पूर्व इस दशहरा उत्सव की नींव रखी थी। इस उत्सव में जाति, धर्म और संप्रदाय के बंधनों को पीछे छोड़कर सभी नागरिक एक साथ जुटते हैं। नगरवासियों और जनजातीय समुदाय की दैनिक पूजा पद्धतियों में भिन्नता होने के बावजूद दशहरा महोत्सव में बैगा, पुजारी, आचार्य और आम नागरिक एक ही वैदिक व पारंपरिक रीति का पालन करते हैं।
शस्त्र पूजा और ‘पक्की डाड़ी’ के जल से कलश स्थापना
नवरात्र के दौरान जशपुर रियासत की सत्ता के अधिष्ठाता भगवान बालाजी के मंदिर और 800 साल पुराने मां काली मंदिर से अस्त्र-शस्त्र लाकर विधि-विधान से शस्त्र पूजा की जाती है।
-
पवित्र जल यात्रा: राजपुरोहित पंडित विनोद मिश्रा के अनुसार, अनुष्ठान की शुरुआत विश्व कल्याण की कामना से होती है। गाजे-बाजे और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पक्की डाड़ी से पवित्र जल लाकर देवी मंदिर में कलश स्थापना और अखंड दीप प्रज्वलित किया जाता है।
-
21 आचार्यों का अनुष्ठान: 800 वर्ष पूर्व आचार्य खगेश्वर मिश्रा द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित मां काली मंदिर में 21 आचार्यों के मार्गदर्शन में 9 दिनों तक नियमित हवन, पूजन और विशेष अनुष्ठान का आयोजन होगा।
वनदुर्गा, 64 योगिनियों का आमंत्रण और तांत्रिक बेल का फल
जशपुर दशहरे की सबसे अनूठी और पारंपरिक रस्में षष्ठी और सप्तमी को निभाई जाएंगी:
-
जुरगुम तक निकलेगी झांकी: षष्ठी की शाम देवी मंदिर से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित ग्राम जुरगुम के लिए विशेष झांकी रवाना होगी। वहां वनदुर्गा के साथ मां काली की सेना की 64 योगिनियों और सतकर्म हेतु नियंत्रित आत्माओं को अनुष्ठान में शामिल होने का आमंत्रण दिया जाएगा।
-
सप्तमी को फल स्थापना: मान्यता के अनुसार, वहां स्थित तांत्रिक बेल के पेड़ (जिस पर आम के पौधे भी उगे हैं) से सप्तमी के दिन आचार्य दल-बल के साथ वनदुर्गा के प्रतीक स्वरूप बेल फल लेकर लौटेंगे, जिसे देवी मंदिर में स्थापित कर विशेष पूजा की जाएगी।
रणजीता मैदान में भगवान बालाजी की सवारी और लंका दहन
विजयादशमी के दिन जिलेभर से हजारों श्रद्धालु भगवान बालाजी के दर्शन के लिए जुटेंगे।
-
काष्ठ रथ में सवारी: भगवान बालाजी की भव्य सवारी दो विशेष लकड़ी के रथों में निकलेगी—एक रथ में भगवान बालाजी और दूसरे रथ में राजपरिवार के सदस्य व पुरोहित सवार रहेंगे।
-
पुतला दहन: यह शोभायात्रा रणजीता स्टेडियम (प्राचीन नाम: ‘रैनी डांड’) पहुंचेगी, जहां नगरभर से मां दुर्गा की प्रतिमाएं भी पहुंचेंगी। मैदान में बनाई जाने वाली कृत्रिम लंका में हनुमान जी द्वारा लंका दहन के बाद रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद और अहिरावण के विशालकाय पुतलों का दहन किया जाएगा।
नीलकंठ पक्षी उड़ाकर की जाएगी विश्व कल्याण की कामना
दशहरा उत्सव का अंतिम और सबसे प्रतीक्षित चरण अपराजिता पूजा के बाद रणजीता मैदान में संपन्न होगा, जहां भगवान के रथ से राजपरिवार के सदस्यों द्वारा नीलकंठ पक्षी को मुक्त कर (उड़ाकर) परंपरा निभाई जाएगी।
-
धार्मिक मान्यता: पौराणिक मान्यता है कि रावण वध के समय रावण द्वारा हनुमान जी को पहचान लिए जाने पर, हनुमान जी ने भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप में दर्शन दिए थे, जिसके बाद ही रावण को मोक्ष मिला था।
-
भविष्य का संकेत: लोकमान्यता है कि यदि नीलकंठ पक्षी उड़कर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर जाता है, तो आने वाला वर्ष पूरे विश्व और क्षेत्र के लिए सुख-समृद्धि लेकर आता है। वहीं अन्य दिशा में उड़ना प्राकृतिक आपदाओं का पूर्व संकेत माना जाता है।


