ब्रेकअप या शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; लिव-इन पार्टनर की खुदकुशी मामले में 6 आरोपियों के खिलाफ केस रद्द
नई दिल्ली:
अगर आपने मकान, दुकान या प्लॉट की पूरी कीमत चुका दी है, अपने नाम पर रजिस्टर्ड सेल डीड (रजिस्ट्री) करवा ली है और कब्जा भी ले लिया है, तब भी यह मान लेना भारी भूल हो सकती है कि संपत्ति का मालिकाना हक पूरी तरह निर्विवाद है। देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि कानून की नजर में ‘दस्तावेज का रजिस्ट्रेशन’ और ‘असली मालिकाना हक’ (Title) दो पूरी तरह अलग विषय हैं।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों के अनुसार, रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 केवल दस्तावेजों के पंजीकरण की व्यवस्था करता है, यह प्रॉपर्टी के असली टाइटल (स्वामित्व) की कोई ‘कन्क्लूसिव गारंटी’ (अंतिम प्रमाण) नहीं देता। इसलिए प्रॉपर्टी खरीदते समय विक्रेता के मालिकाना हक की गहन पड़ताल करने की पूरी कानूनी जिम्मेदारी खुद खरीदार की होती है।
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सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े फैसले: रजिस्ट्रार सिर्फ क्लर्क है, जज नहीं
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के. गोपी बनाम सब-रजिस्ट्रार केस:सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि सब-रजिस्ट्रार का काम केवल दस्तावेज को पंजीकृत करना है, वह कोई न्यायिक अधिकारी (जज) नहीं है जो यह तय करे कि बेचने वाला व्यक्ति उस जमीन का असली और निर्विवाद मालिक है या नहीं। यदि किसी व्यक्ति ने अपने नाम पर रजिस्ट्री करा भी ली है, तो यह अपने-आप साबित नहीं करता कि उसके पास वैध मालिकाना हक था।
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समीउल्लाह बनाम बिहार राज्य केस:अदालत ने मौजूदा व्यवस्था को ‘प्रिजम्प्टिव टाइटल सिस्टम’ (अनुमानित मालिकाना हक) बताया। कोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्री से केवल स्वामित्व का एक अनुमान पैदा होता है, जिसे कोई भी पीड़ित या असल दावेदार कभी भी सक्षम अदालत में चुनौती देकर निरस्त करवा सकता है।
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प्रॉपर्टी खरीदते समय इन 5 कानूनी पैमानों पर जरूर करें जांच
| जांच का बिंदु | क्यों है अनिवार्य? | नजरअंदाज करने का खतरा |
| 1. पूरी टाइटल चेन (Title Chain) | पिछले 30 सालों के पुराने सेल डीड, वसीयत, बंटवारा या गिफ्ट डीड की कड़ियों का मिलान। | यदि पुराने किसी सौदे में फर्जीवाड़ा हुआ तो वर्तमान रजिस्ट्री स्वतः अवैध हो सकती है। |
| 2. एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (EC) | यह जांचना कि प्रॉपर्टी किसी बैंक में गिरवी (Mortgage) या कानूनी विवाद में तो नहीं है। | बैंक का कर्ज न चुकाने पर संपत्ति नीलाम हो सकती है। |
| 3. दाखिल-खारिज (Mutation) | सरकारी राजस्व रिकॉर्ड (7/12, खतौनी या प्रॉपर्टी कार्ड) में नाम दर्ज कराना। | सुप्रीम कोर्ट के अनुसार म्यूटेशन से मालिकाना हक नहीं बनता, यह सिर्फ टैक्स रिकॉर्ड है। |
| 4. बिल्डिंग अप्रूवल व CC/OC | स्वीकृत नक्शा (Sanctioned Plan), कम्पलीशन सर्टिफिकेट और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट की जांच। | अवैध निर्माण पाए जाने पर नगर निगम या विकास प्राधिकरण बुलडोजर चला सकता है। |
| 5. स्पॉट और कब्जा वेरिफिकेशन | कागजी क्षेत्रफल और मौके पर वास्तविक बाउंड्री व कब्जे का भौतिक सत्यापन। | विवादित या सरकारी जमीन पर फर्जी पजेशन मिलने का जोखिम। |
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पुराना फर्जीवाड़ा नई रजिस्ट्री से वैध नहीं होता
कानून का सीधा सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे को उससे बेहतर अधिकार नहीं दे सकता, जितना अधिकार उसके खुद के पास है (Nemo dat quod non habet)।
यदि मौजूदा विक्रेता को वह जमीन किसी ऐसे व्यक्ति से मिली थी जिसका खुद का मालिकाना हक विवादित, फर्जी या अधूरा था, तो भले ही आपकी सेल डीड पूरी तरह रजिस्टर्ड हो, वह पुराना दोष अपने-आप खत्म नहीं होता। असली मालिक के सामने आते ही आपकी रजिस्ट्री अदालत में रद्द की जा सकती है।
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फ्लैट और अपार्टमेंट खरीदार बरतें अतिरिक्त सतर्कता
फ्लैट या बहुमंजिला इमारतों में यूनिट खरीदने वाले ग्राहकों को केवल जमीन के टाइटल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। खरीदारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि:
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जिस फ्लैट या यूनिट को वे खरीद रहे हैं, उसका कारपेट एरिया और लोकेशन स्वीकृत नक्शे के अनुसार हो।
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बिल्डर के पास सक्षम प्राधिकरण से जारी CC (Completion Certificate) और OC (Occupancy Certificate) मौजूद हो।
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कॉमन एरिया और यूटिलिटी सुविधाओं पर कोई कानूनी अड़चन या स्टे न हो।
रजिस्टर्ड सेल डीड संपत्ति हस्तांतरण का एक अनिवार्य माध्यम जरूर है, लेकिन प्रॉपर्टी में सुरक्षित निवेश और जीवनभर की पूंजी बचाने के लिए टाइटल सर्च, राजस्व रिकॉर्ड और कानूनी भारमुक्तता की गहन जांच के बाद ही अंतिम सौदा करना चाहिए।

