भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान एआरसीआई (ARCI) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी क्रांतिकारी तकनीक खोजी है जो लिथियम-आयन बैटरियों के कचरे को मूल्यवान सामग्री में बदल सकती है। वैज्ञानिकों ने इस्तेमाल हो चुकी बैटरियों से प्राप्त ग्रेफाइट का पुन: उपयोग कर उसे ईंधन सेल (Fuel Cell) की दक्षता बढ़ाने के काम में लिया है। यह शोध प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका एसीएस सस्टेनेबल रिसोर्स मैनेजमेंट में प्रकाशित हुआ है।
देश के 99 प्रतिशत से अधिक गांवों के पांच किलोमीटर के दायरे में उपलब्ध हैं बैंकिंग सुविधाएं
आमतौर पर लिथियम-आयन बैटरी और ईंधन सेल प्रौद्योगिकियों में कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती रही है। वैज्ञानिकों ने प्रयुक्त बैटरियों से ग्रेफाइट को निकालकर उसे रासायनिक रूप से संशोधित किया, जिससे उसका सतह क्षेत्र और कार्यक्षमता बढ़ गई। जब इस पुनर्चक्रित ग्रेफाइट को प्लैटिनम उत्प्रेरकों के साथ मिलाया गया, तो इसने एक ऐसा प्रवाहकीय नेटवर्क बनाया जो ईंधन सेल के भीतर ऑक्सीजन अपचयन की प्रक्रिया को तेज कर देता है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मेथनॉल और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसों से होने वाले जहरीले प्रभाव (Poisoning) से प्लैटिनम को बचाती है। पहले के अध्ययनों में केवल क्षारीय माध्यमों पर ध्यान दिया जाता था, लेकिन इस नए शोध ने अम्लीय परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन और स्थिरता साबित की है। इससे न केवल महंगी उत्प्रेरक सामग्रियों पर निर्भरता कम होगी, बल्कि ईंधन सेल का व्यवसायीकरण भी आसान हो जाएगा।
यह खोज लिथियम-आयन बैटरियों के सतत पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम करने में भी मील का पत्थर साबित होगी। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। कचरे से कंचन बनाने की यह तकनीक भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिए एक किफायती और टिकाऊ समाधान पेश करती है।
आधार बना और भी ‘स्मार्ट’ और सुरक्षित: अब फिंगरप्रिंट के साथ चेहरे से भी होगा प्रमाणीकरण; तकनीकी खराबी आने पर भी नहीं रुकेंगे सरकारी लाभ


