CUET PG 2026 के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू अंतिम तिथि 14 जनवरी
जशपुर। फैज़ान अशरफ
आज से 74 वर्ष पहले नागपुर से जशपुर तक 706 किलोमीटर की कठिन यात्रा कर एक युवक वनांचल की दिशा में निकला था यह कोई सामान्य यात्रा नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ऐतिहासिक संकल्प था यह युवक थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली पीढ़ी के स्वयंसेवक बालासाहेब देशपांडे जिन्होंने 1948 में तत्कालीन मध्यप्रांत के दुर्गम वनवासी क्षेत्र जशपुर को अपनी कर्मभूमि बनाया
जशपुर में वनवासी कल्याण आश्रम का 73वां स्थापना दिवस एवं वार्षिकोत्सव 25–26 दिसंबर को भव्य आयोजन
26 दिसंबर 1913 को अमरावती में जन्मे रमाकांत देशपांडे जिन्हें देश बालासाहेब के नाम से जानता है पढ़ाई में मेधावी थे नागपुर से एमए एलएलबी करने के बाद उन्होंने सरकारी सेवा और वकालत दोनों के सुरक्षित मार्ग छोड़े और जीवन को वनवासी समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया
1948 में जशपुर पहुंचकर बालासाहेब ने शिक्षा को माध्यम बनाकर कार्य आरंभ किया उस समय वनवासी समाज सांस्कृतिक अस्मिता के संकट और अलगाव की पीड़ा से जूझ रहा था उन्होंने सेवा के माध्यम से विश्वास जीतने की नीति अपनाई और एक वर्ष के भीतर ही शासन के सहयोग से 100 प्राथमिक और 8 मिडिल स्कूल शुरू कराए
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शिक्षा के बाद उन्होंने वनवासियों को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का अभियान शुरू किया सनातन धर्म सभा की स्थापना की भजन मंडलियों और संकीर्तन के माध्यम से सामाजिक चेतना का विस्तार हुआ इसका परिणाम यह हुआ कि जिन क्षेत्रों में सरकार का प्रवेश कठिन था वहां राष्ट्रभाव का संचार होने लगा
1952 में राजा विजयभूषण सिंह जूदेव के सहयोग से जशपुर में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना हुई 13 बच्चों से शुरू हुआ पहला छात्रावास आगे चलकर देश का सबसे बड़ा वनवासी संगठन बना आज देशभर में 19398 से अधिक सेवा प्रकल्प चल रहे हैं
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कठिन जंगलों में साइकिल से मीलों का सफर तय कर बालासाहेब और उनके साथी वनवासी समाज के बीच पहुंचे शिक्षा स्वास्थ्य संस्कृति और आत्मगौरव को जीवन का आधार बनाया 1962 में आश्रम भवन गिरने के बाद पुनः राजा साहब ने चार एकड़ भूमि दान दी जहां आज भी आश्रम का मुख्यालय स्थापित है
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आपातकाल के दौरान जेल यातना और संपत्ति जब्ती के बावजूद उनका संकल्प नहीं डिगा जेल से निकलने के बाद उन्होंने इस कार्य को देशव्यापी विस्तार दिया झारखंड ओडिशा मध्यप्रदेश पूर्वोत्तर तक छात्रावास और सेवा केंद्र स्थापित हुए
एकलव्य खेल प्रकल्प के माध्यम से वनवासी प्रतिभाओं को राष्ट्रीय पहचान मिली बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र में हजारों वनवासियों का विराट सम्मेलन उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण बना
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1993 में उन्होंने कल्याण आश्रम का नेतृत्व एक वनवासी प्रतिनिधि को सौंपकर स्वयं नेपथ्य में जाना स्वीकार किया 21 अप्रैल 1995 को यह निष्काम कर्मयोगी अनंत यात्रा पर चला गया
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आज जशपुर से देशभर में फैले वनवासी कल्याण आश्रम के हजारों प्रकल्प इस बात के साक्षी हैं कि बालासाहेब देशपांडे केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार एक आंदोलन और वनवासी आत्मगौरव की अमिट पहचान थे

